भारत को अध्यात्मवाद का जगतगुरू बनाकर रहेंगे - डॉ. प्रणव पंडया
देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना राजनांदगांव में - मुख्यमंत्री डॉ. सिंह
रायपुर 18 अप्रैल 2011
गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंडया ने कहा कि भारत को वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का जगतगुरू बनाकर रहेंगे । उन्होंने कहा कि अध्यात्मवाद का मूलमंत्र प्रत्येक धर्म को विज्ञान के आधार पर शिक्षा देना है । विज्ञान जीवन जीने की राह दिखाता है। विज्ञान प्रगतिशीलता की कसौटी पर तर्क, तथ्य और प्रमाण से कसा जाता है, जिससे प्रगति करते हुए गंतव्य तक पहुंचा जा सकता है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि संस्कारधानी राजनांदगांव में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी । जहां विज्ञान और धर्म की समन्वित शिक्षा दी जाएगी।
छत्तीसगढ़ शासन जनसम्पर्क विभाग के तत्वावधान में राज्य के महान विभूति स्वर्गीय बल्देवप्रसाद मिश्र की स्मृति में छत्तीसगढ़ जनप्रतिष्ठा व्याख्यान श्रृंखला के चौथे आयोजन के अवसर पर गायत्री विद्यापीठ परिसर केसर नगर राजनांदगांव में आयोजित कार्यक्रम गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. प्रणव पंडया ने उक्त विचार व्यक्त किए । उन्होंने कहा कि विज्ञान गति देता है और गंतव्य तक पहुंचाने का साधन है । विश्व में परिवर्तन का मूल्य कारण वैज्ञानिक विकास है। लोगों में विज्ञान के कारण ही जागरूकता पैदा हुई है । विज्ञान मनुष्य के शरीर का परीक्षण कर जीवन जीने की राह बताते हैं । विज्ञान ऋषि बनकर हमें आगे बढ़ने का रास्ता बताता है । उन्होंने कहा कि प्रगतिशील समाज के लिए विज्ञान में तर्क, तथ्य और प्रमाण का होना आवश्यक है। किसी भी तथ्य को तर्क और प्रमाण के माध्यम से कसौटी में कसा जाता है, तभी सारतत्व की प्राप्ति होती है । विज्ञान ने हमें प्रगति, गतिशीलता और गंतव्य तक पहुंचने का रास्ता दिखाया है । विज्ञान ने हम सभी को व्यस्त कर दिया है, जिससे मानव जीवन में एक तरफ विकास दृष्टिगोचर होता है तो दूसरी तरफ आम आदमी का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है । उन्होंने कहा कि मानव में जब तक विवेक नहीं होगा, विज्ञान के साधनों का सही अर्थ नहीं समझ पाएगा। उन्होंने कहा कि विज्ञान ने अगर सुविधाएं दी, गति दी और दूरियों को कम किया, किन्तु शरीर का परीक्षण कर शरीर की कमजोरी को भी उन्होंने बताया। डॉ. पंडया ने कहा कि विज्ञान ने हमें नई-नई जानकारियां, नई विद्या प्रदान की, जिससे हम सुविधाभोगी के साथ-साथ विकास की ओर अग्रसर होते गये और इससे आशक्त अलगाव को बढ़ावा मिला है। उन्होंने कहा कि विज्ञान सुख-सुविधा देने का साधन है, किन्तु साधनों को परिष्कृत कर उपयोग के लायक बनाना अध्यात्म का काम है। विज्ञान धर्म के बिना अधूरी है, धर्मकर्मकांड पर बल देता है किन्तु अध्यात्म कर्मभक्ति की उपयोगिता तक सीमित नहीं रहती।
डॉ. पंडया ने कहा कि अध्यात्म का मूलमंत्र धर्म को विज्ञान के आधार पर शिक्षा देना है। अध्यात्म धर्म के रूप में किए जा रहे अत्याचार को दूर कर दुखों के निवारण करने का मार्ग बताता है । उन्होंने स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म को अध्यात्म की ओर मोड़ने के लिए दिशा दी। उन्होंने कहा कि धर्म का मतलब श्रेष्ठता को जीवन में उतारना है। सद्गुण उपासना जैसी अच्छाईयों को जीवन में उतारकर देवत्व धारण करने की क्षमता मानव में है। इसीलिए कहा गया है कि धर्मोधार्यतेप्रजा अर्थात प्रजा जो धारण करती है वही धर्म है। डॉ. पंडया ने कहा कि मध्यकाल में धर्म की बर्बरता, नारी उत्पीड़न मानवीय मूल्यों का गिरना, इन सभी बातों के कारण स्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना कर समाज को क्रांतिकारी चिंतन दिया । उन्होंने कहा कि उपनिषद, धर्मशास्त्र, गीता, पुराण और दर्शन में ज्ञान का महत्व छिपा हुआ है, जिसे अध्ययनकर जीवन में उतारने की आवश्यकता है तभी मानव जीवन का मूल्य समझ पाएगा। उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर ने विदेशियों को खींचकर भारत लाया और अध्यात्म, वेद, ज्ञान-विज्ञान के आधार पर धर्म की अध्यात्मिकता को उन्होंने स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि बीमारी और भागदौड तनाव से ही पैदा होते हैं । तनाव संपूर्ण मानव समाज को ग्रसित कर लिया है, जिसको दूर करने का एकमात्र उपाय अध्यात्मिकता है । अध्यात्म के सहारे जीवन को तनाव से मुक्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि धर्म और अध्यात्म साथ-साथ मिलकर चलते हैं तो समाज विकास करता है। अनुशासन के आधार पर ही हमें गति मिलती है। उन्होंने कहा कि धर्म अपूर्ण विज्ञान है और विज्ञान अपूर्ण धर्म है। दोनों के सार्थक समन्वय से ही संतुलन बना रहता है और जीवन में गति आती है। उन्होंने कहा कि मानव का मस्तिष्क एक कम्प्यूटर की भांति है । विज्ञान का उदभव पश्चिम में हुआ किन्तु मूलभूत रूप में हजारो वर्ष पूर्व इसका आविष्कार भारत में हो चुका था। वैज्ञानिक अध्यात्म के माध्यम से आधुनिक और अध्यात्म साथ-साथ चलकर प्रगतिशील समाज की रचना में सहायक सिध्द होंगे। उन्होंने विज्ञान को अंधा और धर्म को लंगड़ा के माध्यम से उदाहरण प्रस्तुत कर कहा कि अंधा और लंगड़ा आपस में मिलकर प्रयास करें, तो अपने उद्देश्य में सार्थक हो सकते हैं। इसलिए हमें विज्ञान और अध्यात्म दोनों का समन्वित रूप से अनुशरण करते हुए जीवन में प्रगति और खुशहाली ला सकते हैं ।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस अवसर पर कहा कि विज्ञान में हमारे सामने नई-नई चुनौतियां खड़ी की है, किन्तु 21वीं सदी में विज्ञान की कल्पना से भयभीत हो रहे हैं । उन्होंने कहा कि आज चन्द्रमा और मंगल जैसे ग्रह में बस्ती बसाने की कल्पना की जा रही है। आने वाले 50 वर्ष बाद विज्ञान के नये-नये चमत्कार देखने को मिलेंगे। उन्होंने कहा कि शरीर के प्रत्येक पुजर्ें को बदलने की क्षमता विज्ञान में रहेगी। असीमित संभावनाओं का द्वार विज्ञान खोलता है किन्तु कल्पना को यथार्थ में लाने का काम ही विज्ञान करता है। दूसरी तरफ विज्ञान विध्वसंकारी भी है जिसे अध्यात्म की परिकल्पना से नियंत्रण किया जा सकता है । धर्म की आवश्यकता सोच और चिंतन को नई दिशा देना है इसीलिए कहा गया है कि हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा, हम बदलेंगे-युग बदलेगा। उन्होंने कहा कि संस्कारधानी राजनांदगांव की इस धरती ने मुझे राजनीतिक दृष्टि से सर्वोच्च शिखर पर पहुंचाया है और गुरू की कृपा से हमेशा छत्तीसगढ़ को बेहतर बनाने के लिए प्रयासरत रहता हूं। उन्होंने कहा कि राजनांदगांव को यह सौभाग्य मिला कि यहां देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना की जाएगी। यहां की मिट्टी लेकर डॉ. पंडया हरिद्वार जा रहे हैं, जिससे इस संकल्प को शीघ्र ही साकार रूप मिलेगा। डॉ. सिंह ने कहा कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में प्रस्ताव लाकर छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी रजानांदगांव में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय की स्थापना को मंजूरी दिलाएंगे, जिससे लोगों को विज्ञान, धर्म, अध्यात्म, दर्शन की शिक्षा मिलेगी।
मुख्यमंत्री डॉ. सिंह ने गायत्री परिवार के प्रमुख डॉ. पंडया को छत्तीसगढ़ की इस पावन भूमि में व्याख्यान देने आने के लिए बधाई दी और स्मृति चिन्ह भेंट की। कार्यक्रम में लोकसभा सांसद श्री मधुसूदन यादव, पाठयपुस्क निगम के अध्यक्ष श्री अशोक शर्मा, महापौर श्री नरेश डाकलिया, जिला पंचायत अध्यक्ष श्री दिनेश गांधी, पूर्व सांसद श्री प्रदीप गांधी, मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी श्रीमती वीणा सिंह, छत्तीसगढ़ संस्कृति फाऊंडेशन के अध्यक्ष राजेन्द्र मिश्र ने छत्तीसगढ़ संस्कृति फाऊंडेशन के आयोजन के संबंध में विस्तृत जानकारी दी। छत्तीसगढ़ गायत्री परिवार के प्रमुख श्री अरूण मढरिया ने भी अपने विचार व्यक्त किए । कार्यक्रम का संचालन संयोजक एवं आयोजन समिति छत्तीसगढ़ संस्कृति फाऊंडेशन श्री कनक तिवारी ने किया और छत्तीसगढ़ शासन के जनसम्पर्क विभाग के संचालक श्री उमेश द्विवेदी ने आभार प्रदर्शन किया। इस अवसर पर जनप्रतिनिधिगण, गणमान्य नागरिक, पत्रकारगण और गायत्री परिवार से जुड़े हुए लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

