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छत्तीसगढ़ विधानसभा रायपुर में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का भाषण दिनांक 26 अक्टूबर 2010 : चतुर्थ राष्ट्र मंडल संसदीय संघ, भारत और एशिया क्षेत्र सम्मेलन

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When Oct 26, 2010
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 ''आतंकवाद एवं नक्सलवाद : लोकतंत्र को चुनौती- क्षेत्र में संयुक्त प्रयास की आवश्यकता''

एशिया महाद्वीप में लोकतंत्र की मशालें थामने वालों का उदीयमान छत्तीसगढ़ में हार्दिक अभिनंदन!

भारत गणराज्य की प्रादेशिक बिरादरी में हमारा उदय एक दशक पहले ही हुआ है। तथापि, अपनी वैदिक विरासत और आदिवासी संस्कृति की वजह से हमारा एक समृध्द अतीत रहा है। इसकी धरती पर अनेक मत, सम्प्रदाय, बोलियों , जीवनशैली और जैव-वनस्पति प्रजातियों ने साथ-साथ अपना विकास किया है।र् ईष्या नहीं स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, एक दूसरे के लिए गुंजाइशें और प्रकृति की पूजा जैसी कुछ बातें हैं - जिनसे छत्तीसगढ़ियों ने अपनी पहचान बनाई है। सूरज की छत्तीस रश्मियों की तरह रंग-बिरंगी और तेजस्वी परम्पराओं के इस प्रदेश में आपको, अपने बीच पाकर हम छत्तीसगढ़ के 2.10 करोड़ लोग, सचमुच आज बहुत खुश हैं।
बीसवीं सदी की शुरूआत में विश्व-राजनीति में दो रूझान देखने को मिले। पहला-लोकतंत्र, जिसकी प्रबल होती धारा में हमारा-आपका शुमार है एवं दूसरा-साम्यवाद, आगे जाकर साम्यवादी सोवियत रूस बिखर गया और चीन ने अपने सामाजिक- आर्थिक सरोकारों में बड़े बदलाव किए। लोकतंत्र जहां पहले से अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, जवाबदेह, और मुक्त अर्थव्यवस्था के पक्षधर साबित हुए हैं, वहीं साम्यवादी देश भी लोहे की अपनी पुरानी दीवारों को तोड़ चुके हैं।
खुलेपन की इस बयार से जहां कुछ उम्मीदें जागी हैं, वहीं माथे पर चिन्ता की लकीरें भी खींची हैं। पिछली आधी सदी से कहीं अपनी पहचान को लेकर, तो कहीं कथित आर्थिक विषमताओं की आड़ में निहित स्वार्थ सक्रिय रहे हैं। आज एशिया समेत आधी से ज्यादा दुनिया आतंकवाद से सिहर रही है।
भारत जैसे विशाल देश की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए समुद्र सहित प्राय: सभी दिशाओं से आतंकवादियों की घुसपैठ की आशंका बनी रहती है। हजारों किलोमीटर में फैली सीमाओं की लगातार चौकसी करना और आतंकवादियों के आवागमन को रोके रखना एक कठिन कार्य है। सेना और अर्ध्दसैनिक बलों की सर्वोत्तम कोशिशों के बावजूद आतंकवादी, पड़ोसी देशों से आकर तबाही मचाते रहते हैं। यह त्रासदी अकेले भारत की ही नहीं बल्कि इस ऐतिहासिक संगठन में शामिल लगभग हरेक एशियाई देश की है।
आतंकवाद से लोकतांत्रिक देशों में सबसे ज्यादा खमियाजा वहां की जनता को भुगतना पड़ रहा है। एक ओर इसकी रोकथाम के लिए अपने बहुमूल्य संसाधनों को झोंकना पड़ रहा है, तो दूसरी ओर विकास और व्यवस्था के सकारात्मक कामों के लिए संसाधन कम पड़ रहे हैं। गरीबी, अशिक्षा, कुपोषण के विरूध्द लड़ाई को चाहकर भी तेज नहीं किया जा सका है।
यहां छत्तीसगढ़ में हम आतंकवाद के उस रूप का प्रतिदिन सामना कर रहें हैं, जिसे नक्सलवाद कहा गया है। हमारे प्रधानमंत्री ने 4 नवम्बर 2004 को देश के पुलिस प्रमुखों के सम्मेलन में कहा था कि दक्षिण में आन्ध्रप्रदेश से लेकर उत्तर में उत्तरप्रदेश और पूर्व में पश्चिम बंगाल तक फैले आदिवासी इलाके, वामपंथी आतंकवादियों के शिकारगाह बन चुके हैं। वामपंथी उग्रवाद को हमारे प्रधानमंत्रीजी देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए अकेला सबसे बड़ा खतरा मानते हैं।
    1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी में किसानों के सशस्त्र विद्रोह के बारे में सब जानते हैं। उससे भी पहले सीमावर्ती राज्य के तेलंगाना से अनेक हथियारबंद छापामार सशस्त्र विद्रोह के असफल होने पर जान बचाने के लिए बस्तर में आकर छिप चुके थे। चालीस हजार वर्ग किलोमीटर में फैला दुर्गम जंगली इलाका, जहां भोले-भाले आदिवासी रहते थे, उनके छिपने के लिए सुरक्षित था। यहीं से दक्षिण बस्तर के लोगों के साथ वाम चरमपंथियों के संपर्को का सिलसिला शुरू हुआ।
1967 के आसपास दक्षिण बस्तर में नक्सलियों की आमद-रफ्त शुरू हुई जो योजनाबध्द रूप से रफ्ता-रफ्ता बढ़ती गई। आठवें और नवें दशक में उन्होंने अबूझमाड़ के बहुत बड़े क्षेत्र में अपना दबदबा बना लिया। तब से छत्तीसगढ़ बनने तक इंद्रावती में बहुत पानी बह गया, हालात बदतर होते गए। जहाँ-जहाँ नक्सलियों का प्रभाव बढ़ा वहां वन और खनिज संपदा के दोहन में नक्सली बिचौलिये की भूमिका निभाने लगे। कोई भी विकास कार्य नक्सली होने नहीं देते थे। पहले वामपंथी विचारक बस्तर की आदिवासी संस्कृति को सुरक्षित रखने के नाम पर वहां स्कूल, सड़क और राष्ट्रीय जीवनधारा से बस्तर को जोड़ने के खिलाफ थे, फिर नक्सली अपनी खास कार्यशैली की सुरक्षा के लिए इनका विरोध करने लगे।
आकार में केरल प्रदेश से भी बड़े, दो-तिहाई से अधिक आदिवासी आबादी वाले इस क्षेत्र तक न रेल पहुंची, न कायदे की सड़कें। अधोसंरचना के प्राय: सभी मानदंडों की कसौटी पर बस्तर राष्ट्रीय औसत से कहीं पीछे रह गया। विकास के लिहाज से यह एक बड़ी खाई थी। जिस प्रदेश में 50% वन हों, जहां हर मौसम में लघु वनोपज और बेशकीमती जड़ी-बूटियां मिलती हों, उसका भारी दुर्लक्ष्य हुआ। वन-कानूनों की विसंगतियों और उस पर चली लंबी अदालती कार्यवाहियों की वजह से आदिवासियों की एक पूरी पीढ़ी को भूमि-अधिकारों से वंचित रहना पड़ा। उनकी जमीन से उन्हीं को बेदखल करने और अपने घर में ही उन्हें बेगाना बना देने की पीड़ा वही जान सकता है, जिसने उसे भोगा हो। ऐसे भोले-भाले लोगों की नियति बन गई नक्सलियों के आदेशों की तामील करना और उनकी बेगार करना। पुलिस प्रशासन से दूरी बनी रहने के कारण, विधि का शासन सच्चे अर्थों में लंबे अर्से तक वहां पहुंचा ही नहीं!
    ऐसा नहीं है कि बस्तर क्षेत्र के आदिवासी मानस ने नक्सलियों के अत्याचारों को सिर झुकाकर स्वीकार ही कर लिया हो, वहां 1990-91 में जन जागरण अभियान शुरू किया गया। वर्ष 1999 में कांकेर के कुछ क्षेत्रों में और सन् 2005 में बस्तर में भी इनके खिलाफ विद्रोह किया।
छत्तीसगढ़ में हमने नक्सलियों के दुष्प्रचार को करीब से देखा है और उसकी सच्चाई जनता के सामने रखी है। वे कहते हैं कि वहां वर्ग संघर्ष है, शोषण है, अत्याचार है। सच यह है कि दक्षिण बस्तर जहां वे अपनी पूरी ताकत झोंके हुए हैं वहां न जमींदार हैं, न भूमिहीन किसान। अमीर और गरीब आदिवासी एक-सा रहते हैं। वनों के सहारे जिनकी आजीविका चलती है, उनकी अपनी समितियां लघु वनोपज को खरीदती हैं। वे लाभ को उन्हीं में बांटती हैं। अधिकांश इलाका वन-भूमि होने के कारण, बड़े किसानों की तो वहां कल्पना भी नहीं की जा सकती। जब औद्योगीकरण उस क्षेत्र में हुआ ही नहीं तो वहां मालिक-मजदूर के रिश्तों में  कटुता कहा से आई ? पुलिस अत्याचार की मनगढंत कहानियां फैलाई जाती है जबकि वहां थानों की उपलब्धता और पुलिस बल की संख्या भी कई दशकों से राष्ट्रीय औसत से काफी कम रही है। वे विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) की वजह से किसानों की जमीन हड़पने की बात कहते हैं। हमारे यहां उस पूरे इलाके में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बनाया गया है। खेती की जमीन के अधिग्रहण का तो कोई सवाल ही नहीं है, क्योंकि वनों में इस पैमाने पर खेती करना या उद्योग चलाना कानूनी ढंग से संभव नहीं है।
    वास्तविकता यह है कि आदिवासियों के विरूध्द दशकों से लंबित जल-जंगल जमीन के मुद्दों से जुड़े वन अपराध संबंधी हजारों मामले हमने सद्भावनापूर्वक वापस ले लिए। वन क्षेत्रों के निवासियों को 2 लाख 14 हजार अधिकार पत्र दिए गए। हाट-बाजारों में मुफ्त नमक, सस्ता चावल और मिट्टी का तेल उपलब्ध कराया। अपनी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को चुस्त-दुरूस्त और आधुनिक बनाकर एक मॉडल देश के सामने रखा। मैं कल के सत्र में इसकी विस्तार से चर्चा करूंगा। आदिवासी बच्चों के लिए आश्रम शालाएं, स्कूलों में मध्यान्ह भोजन, मुफ्त कॉपी किताबों की व्यवस्था, गर्भवती महिलाओं के लिए पोषण आहार, चलते-फिरते क्लीनिक्स, पेयजल, सौर-बत्तियां, वनोपज एकत्र करने वालों के लिए चरण- पादुकाएं देना। प्रयासों की यह सूची लंबी है। संक्षेप में, राज्य और केन्द्र की सरकारों की तरफ से अनुसूचित जनजातियों के कल्याण के लिए योजनाओं और कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी गई। इस पर भी दुष्प्रचार यह कि, शोषण हो रहा है।
वन क्षेत्रों के नागरिकों ने इस दुष्प्रचार का जवाब कई बार अपने ढंग से दिया। पंचायती राज संस्थाओं के लिए हुए चुनावों में नक्सलियों के बायकाट की धमकी के बावजूद कहीं कहीं तो 80 प्रतिशत तक वोटिंग हुई। यह है हमारी असली ताकत और लोकतंत्र के प्रति छत्तीसगढ़ के वनवासियों का रूझान। यह जानते हुए भी कि नक्सली पंचायती राज संस्थाओं और उनके पदाधिकारियों से परहेज करते हैं बल्कि मौका मिलने पर उन्हें जान से भी मार डालते हैं- बस्तर में पंचायतों के प्रति आकर्षण कम नहीं हुआ। आम-आदिवासी आपसी बातचीत से सामूहिक फैसले लेने में विश्वास करता है क्योंकि वही उसकी परंपरा है, वही उसकी आस्था है। नक्सली, इस प्रवृत्ति से डरता है। पिछले कुछ अवसरों पर जब-जब आदिवासी समुदाय शांति की कामना से एकजुट हुआ, तब तब नक्सली दमन तेज हुआ। नक्सली, लोकतंत्र को अपना शत्रु समझते हैं क्योंकि नागरिकों को वे मूक और विचार शून्य अनुयायियों में बदलना चाहते हैं।
उनका लक्ष्य तो एक गिरोह की सत्ता को स्थापित करना है। उनकी कथित जन अदालतों की कार्यशैली से जाहिर है कि कानून के शासन में उनकी कोई आस्था है ही नहीं। सब प्रकार की सर्जनात्मक कलाओं और अभिव्यक्ति की आजादी को वे समूल नष्ट करना चाहते हैं। धर्म, जिनके लिए अफीम और सामाजिक संस्थाएं जिनके लिए घृणा की सबब हों- ऐसे बर्बरों से आप हम उम्मीद भी क्या कर सकते हैं। जो नक्सलवादी मौका मिलते ही स्कूलों की इमारतों को ढहाते और शिक्षकों को भगा देते हैं - वे किस मुंह से वैज्ञानिक प्रगति, शोध अनुसंधान और प्रगति की बात कर सकते हैं ? वे सम्पूर्ण व्यवस्था को आदिमकालीन युग मे ले जाना चाहते हैं बिना यह जाने कि समय चक्र को विपरीत दिशा में घुमा पाना, न तो उचित है और न संभव।
हमारे प्रदेश की सर्वोच्च पंचायत-विधानसभा, जिसके सभाभवन में हम लोग बैठे हैं, वह नक्सली आंतक के खिलाफ एकजुट हैं। हमने इस समस्या पर यहां विशेष गोपनीय बैठक में विचार-विमर्श किया था। साथ ही समय-समय पर हुए वाद-विवाद के नतीजों को क्रियान्वित भी करते रहे हैं। इस लड़ाई में हमारे नागरिकों एवं सुरक्षा बलों का मनोबल ऊंचा है। अपराधों की राह पर भटक गए लोगों के विवेक को जगाने की कोशिश हम लगातार करते रहे हैं।
नक्सल आतंक को खत्म करने में समाज का प्रबुध्द वर्ग और स्वैच्छिक संगठन प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। जो किन्हीं कारणों से सक्रिय राजनीति से दूर रहते हैं ऐसे लोग भी धार्मिक, सामाजिक अनुष्ठानों के जरिए उन क्षेत्रों को अपनी कर्मस्थली बना सकते हैं, जहां फैले शून्य को नक्सलवादी लाल रंग से भर देने में लगे हैं। युवा नेतृत्व को पंचायतों और विधान मंडलों में आगे आने का अवसर दिया जाना चाहिए। विशेष रूप से विद्यार्थियों को सामाजिक सरोकारों से जुड़ने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे पहले कि गलत तत्व उनकी ऊर्जा और क्षमता को हिंसा और नकारात्मक दिशा में ले जा पाएं, उन्हें रचनात्मक कार्यक्रमों से जोड़ना जरूरी है।
देश के भीतर और सदस्य देशों के बीच बिना आपसी सहयोग के इस प्रकार के संगठित गिरोहों द्वारा की जा रही हिंसक गतिविधियों की रोकथाम संभव नहीं है। प्रत्यार्पण संधियों और खुफिया सूचनाओं के तत्परता से आदान-प्रदान का महत्व अपनी जगह है। प्रयास इस बात के होने चाहिए कि लोगों में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था बढ़े और मौजूदा व्यवस्था में विश्वास मजबूत हो। विश्व में लोकतंत्र का युग जिन मानवीय सरोकारों की रक्षा और सर्वजनहिताय सत्ता की स्थापना के लिए शुरू हुआ, उसे निभाना होगा। बिना किसी भेदभाव के सबको न्याय मिले, समय से मिले, कोई भूखा और वंचित, शोषित, उपेक्षित महसूस न करें, बल्कि लोकतंत्रीय सत्ता में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे। देशों की सीमाएं, अपराधियों, षड़यंत्रकारियों और लोकतंत्र के विरोधियों के लिए पूरी तरह सील की जाएं, लेकिन व्यापार-व्यवसाय, वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और गुणीजनों के लिए सदा खुली रहें। हमारे वेदों में ''आ नो भद्रा: कृण्वन्तो यन्तु विश्वत:'' कहा गया है। अर्थात् अच्छे लोगों, अच्छे विचारों और अच्छे कामों का आगमन विश्व के हर कोने से होना चाहिए।
धन्यवाद,
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