छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा के कारण शिक्षा व्यवस्था गंभीर रूप से बाधित
प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री श्री अग्रवाल ने केन्द्र से मांगा विशेष पैकेज
केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री सिब्बल के साथ नई दिल्ली में हुई बैठक
रायपुर 10 जून 2010

छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने प्रदेश के नक्सल प्रभावित बस्तर, नारायणपुर, दक्षिण बस्तर (दंतेवाड़ा), बीजापुर, उत्तर बस्तर (कांकेर) और राजनांदगांव जिले में शिक्षा के प्रसार के लिए विशेष पैकेज घोषित करने की मांग केन्द्र शासन से की है। श्री अग्रवाल ने आज नई दिल्ली में शास्त्री भवन में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल के साथ आयोजित बैठक में बिन्दुवार विभिन्न मांगों के सबंध में पत्र सौंप कर कार्रवाई करने आग्रह किया। केन्द्रीय मंत्री श्री सिब्बल ने बैठक में उपस्थित मानव संसाधन मंत्रालय के अधिकारियों को इस दिशा में तत्काल कार्रवाई करने के निर्देश दिए। स्कूल शिक्षा मंत्री श्री अग्रवाल ने छत्तीसगढ़ में शिक्षा के अधिकार कानून 2009 के क्रियान्वयन के लिए प्रदेश शासन द्वारा की गई तैयारियों की जानकारी दी और शिक्षा के प्रसार में हो रही कठिनाइयों और समस्याओं की ओर केन्द्रीय मंत्री का घ्यान आकृष्ट किया। बैठक में केन्द्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री श्रीमती डी. पुरन्देश्वरी, छत्तीसगढ़ सरकार के स्कूल शिक्षा सचिव श्री सुनील कुजूर, संचालक लोक शिक्षण संचालनालय श्री के.आर. पिस्दा भी उपस्थित थे।

श्री अग्रवाल ने बैठक में श्री सिब्बल से इस विषय पर चर्चा में कहा कि प्रदेश शासन द्वारा उपलब्ध संसाधनों में शिक्षा के प्रसार के लिए संकल्पित होकर शैक्षिक क्षेत्र में सुदृढ़ तंत्र की स्थापना के लिए कार्य किया जा रहा है, ताकि प्रदेश का हर बच्चा शिक्षा की गतिविधियों से जुड़कर एक कुशल मानव संसाधन के रूप में परिपक्व हो सके। राज्य शासन द्वारा शैक्षणिक संस्थाओं में अधोसंरचनाएं विकसित करने के कार्य लगातार किए जा रहे हैं। राज्य में प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा विद्यालय स्थापित करने का कार्य लगभग पूर्ण हो गया है। अब जनसंख्या बढ़ने पर ही ऐसे नये विद्यालय खोले जाएंगे। माध्यमिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण के अन्तर्गत व्यापक सर्वे कर आवश्यक माध्यमिक विद्यालयों का आंकलन किया गया है। वर्तमान में राज्य में स्कूली बच्चों की संख्या करीब 56 लाख है। सभी विद्यार्थियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार निरंतर प्रयासरत है। राज्य में प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों में एक लाख 82 हजार 997 शिक्षक के पद स्वीकृत है। शिक्षकों के नये सेट-अप अनुसार विद्यार्थियों और शिक्षकों की संख्या का 40 अनुपात 01 है। छत्तीसगढ़ में प्रत्येक प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय के लिए प्रधान अध्यापक के पद स्वीकृत किए गए है। शैक्षणिक मापदण्डों के संदर्भ में छत्तीसगढ़ प्रदेश की स्थिति अन्य राज्यों की तुलना में संतोषप्रद है। नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 में दिए गए प्रावधानों के संदर्भ में भी छत्तीसगढ़ अच्छी स्थिति में है, फिर भी इन प्रावधानों के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए मैदानी कार्यालयों को निरंतर पदों के आंकलन हेतु निर्देश जारी किए गए हैं।
श्री अग्रवाल ने केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को बताया कि वर्तमान में प्रदेश में 2.47 प्रतिशत् की दर से शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं अत: नये पदों की स्थापना एवं सेवानिवृत्त होने वाले शिक्षकों के पदों को मिलाकर लगभग 30 हजार पद वर्तमान में रिक्त हैं, यद्यपि राज्य में इन पदों को भरने के लिए प्रक्रिया चल रही है। प्रदेश में लगभग 28 हजार शिक्षकों को प्रशिक्षित किया जाना है। राज्य में इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के माध्यम से प्रशिक्षण दिया जा रहा था, परन्तु राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद द्वारा इसकी क्षमता पर रोक लगाए जाने से प्रशिक्षण की कार्रवाई धीमी हो गई है। राज्य की अकादमिक संस्था राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद द्वारा डाईट और शिक्षा महाविद्यालयों के माध्यम से प्रशिक्षण का प्रस्ताव प्रस्तुत किया है, जिनमें लगभग 6 हजार शिक्षक प्रशिक्षित हो सकेंगे। यदि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद राज्य के प्रस्ताव का अनुमोदन करती है, तो अप्रशिक्षित शिक्षकों को 3 वर्षों में प्रशिक्षण दिया जा सकेगा। अधिनियम की धाराओं के पालन के लिए अनिवार्य है कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद राज्य के प्रस्ताव पर अनुमोदन दें। राज्य में शैक्षिक पदों को भरते समय यह पाया गया है कि विज्ञान, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, गणित, अंग्रेजी व संस्कृत के पदों पर योग्यताधारी उम्मीदवार नहीं मिलने से इन विषयों के पदों पर शिक्षकों की भर्ती में कठिनाई महसूस हो रही है।
स्कूल शिक्षा मंत्री ने कहा कि राज्य में नि:शुल्क व अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत विभिन्न नियमों और उपनियमों के निर्माण के लिए प्रदेश के बुध्दिजीवियों, शिक्षाविदों, पत्रकारों, वकीलों, समाजसेवियों एवं वरिष्ठ नागरिकों को आमंत्रित कर उनकी राय ली गई है। नियमों-उपनियमों का प्रारूप शासन स्तर पर परीक्षण की स्थिति में है। आगामी दो-तीन माह में इसे अंतिम रूप देकर प्रकाशित करने का कार्य पूर्ण कर लिया जायेगा। अग्रिम रूप से अधिनियमों में वर्णित प्रावधानों के अनुरूप राज्य में क्रियान्वयन के लिए समस्त प्रारंभिक तैयारियां कर ली गई है। राज्य बाल संरक्षण आयोग गठित करने के संबंध में कार्रवाई पूर्ण हो चुकी है, मात्र पदों की पूर्ति की जाना शेष है, जिसे शीघ्र पूर्ण कर आयोग को क्रियाशील किया जाएगा। प्रारंभिक शिक्षा के लोकव्यापीकरण के लिए राज्य में अधोसंरचनाएं विकसित की जा चुकी है एवं लक्ष्य की निरंतरता हेतु प्रतिवर्ष अधिक से अधिक व्यय किया जाना है। पूर्व में जहां केन्द्रांश और राज्यांश का अनुपात 75 अनुपात 25 था, वह अनुपात 2010-11 से 55 अनुपात 45 हो गया है। नये राज्य के लिए उपरोक्त व्यय भार उनकी आय के सीमित संसाधनों की तुलना में अधिक है। अत: राज्य का अनुरोध है कि माध्यमिक शिक्षा अभियान के अन्तर्गत् केन्द्रांश तथा राज्यांश का अनुपात 75 अनुपात 25 किया जाए।
उन्होंने कहा कि नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के प्रावधान के अनुसार राज्य में बच्चों की परीक्षाएं नहीं ली जानी है, उनके स्थान पर सतत् समग्र मूल्यांकन किया जाना है। नई परिस्थितियों में बच्चों के शैक्षिक स्तर पर प्रभाव पड़ने की संभावना प्रबल दिखाई पड़ती है। अत: मेरा मानना है कि केन्द्र एवं राज्य स्तर पर एक ऐसी प्रणाली विकसित की जाए। जिससे राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों की शैक्षिक गुण्ावत्ता अप्रभावित रहे। इसके लिए शिक्षकों एवं प्रशासकों को प्रशिक्षित किया जाना अपेक्षित है एवं केन्द्र सरकार को इस दिशा में सबसे अधिक पहल की जाना चाहिए। अधिनियम के प्रावधानों के क्रियान्वयन हेतु बड़ी मात्रा में अतिरिक्त राशि की आवश्यकता है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत् अतिरिक्त आवश्यकताओं के प्रस्ताव को पूरक प्रस्ताव के रूप में केन्द्र सरकार द्वारा स्वीकृत किया जाना अधिनियमों के प्रावधानों के अनुकूल होगा।
श्री अग्रवाल ने कहा कि राज्य में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा की निरंतरता एक समस्या के रूप में सामने आयी है। इसके बाद भी शैक्षणिक गतिविधियों को निर्बाध रूप से संचालित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। विकासखण्ड मुख्यालयों पर 500-500 सीटर विशेष स्कूल संचालित किए जाएं, जिसमें शिक्षक आवास गृह एवं बच्चों को आवासीय सुविधा प्राप्त हो व इन स्थानों पर भवन निर्माण के लिए स्थानीय आवश्यकता अनुरूप योजना बनाई जाए। राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के अन्तर्गत् मॉडल स्कूल एवं गर्ल्स हॉस्टल भवन की स्वीकृति दी गई है, जो केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के 2007 के प्रचलित एस.ओ.आर. पर आधारित है, यह तीन वर्ष पुरानी है। उक्त दर पर आज निर्धारित मापदण्ड के अनुरूप भवन बनाया जाना संभव नहीं है, जबकि विगत् 3 वर्षों में भवन निर्माण में उपयोग होने वाली सामग्रियों की दर डेढ़ गुनी बढ़ गई है। अत: भवन की ईकाई लागत बढ़ायी जाए। इसके साथ ही पुरानी स्वीकृतियों को पुनरीक्षित करने की आवश्यकता है। प्रदेश में खोले जाने वाले मॉडल स्कूलों का कार्यक्षेत्र विकासखण्ड है, जहां पर 25 से 30 किलोमीटर दूर से भी बच्चे अध्ययन करेंगे। उक्त विद्यालयों में कोई आवासीय सुविधा नहीं है ऐसी परिस्थिति में बालक एवं बालिकाओं के लिए आवासीय सुविधा उपलब्ध कराना जरूरी है। मॉडल स्कूल परिसरों में ही बालक-बालिकाओं के लिए अलग अलग दो-दो सौ सीटर आवासीय सुविधायुक्त छात्रावास प्रारंभ किया जाए। मॉडल स्कूल भीतरी क्षेत्रों में स्थित है, जहां शिक्षकों के रहने की कोई सुविधा नहीं है। इन परिस्थितियों में शिक्षकों को भी आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने से बच्चे इस योजना से भली-भांति लाभान्वित हो सकेंगे। प्रदेश में साक्षर भारत कार्यक्रम अन्तर्गत् 8 जिले में कार्यक्रम संचालित है। शेष 10 जिलों में से अधिकांश जिले नक्सल प्रभावित जिले हैं जहां साक्षरता कार्यक्रम का विशेष महत्व है। केन्द्र शासन से अपेक्षा है कि राज्य के शेष 10 जिलों में भी कार्यक्रम की स्वीकृति शीघ्र प्रदान की जाए।

