छत्तीसगढ़ में संयुक्त वन प्रबंधन योजना को मिली शानदार सफलता
तैंतीस हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक जंगलों की सुरक्षा 27 लाख लोगों के हाथों में
संयुक्त वन प्रबंधन योजना के तहत छत्तीसगढ़ में लगभग सत्ताईस लाख 63 हजार ग्रामीण जंगलों की सुरक्षा के साथ-साथ वनों के विकास में भी अपना योगदान दे रहे हैं। इन ग्रामीण वनवासियों को 33 हजार 190 वर्ग किलोमीटर के वन क्षेत्रों के रख-रखाव से संबंधित महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गयी हैं। यह राज्य के कुल वन क्षेत्रों का लगभग 55.52 प्रतिशत इलाका है। इन ग्रामीणों को योजना के तहत सात हजार 788 संयुक्त वन प्रबंधन समितियों में सदस्य के रूप में शामिल कर जंगल बचाने और जंगल लगाने के कार्यों के साथ-साथ गांवों के विकास के लिए लघु वनोपजों पर आधारित कुटीर उद्योगों से भी जोड़ा गया है।
उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के 19 हजार 744 गांवों में से ग्यारह हजार 185 गांव वन क्षेत्रों की सीमा से पांच किलोमीटर के भीतर स्थित हैं। इन गांवों में वन संरक्षण और वन संवर्धन के कार्यों में जनभागीदारी बढ़ाने के लिए संयुक्त वन प्रबंधन योजना शुरू की गई है। वन विभाग के अधिकारियों ने आज यहां बताया कि संयुक्त वन प्रबंधन समितियों के अलावा राज्य में 915 प्राथमिक लघु वनोपज सहकारी समितियां भी कार्यरत हैं, जिनमें ग्रामीणों के साढ़े तेरह लाख से अधिक परिवार शामिल किए गए हैं। इन्हें तेंदूपत्ता और साल-बीज संग्रहण सहित विभिन्न प्रकार के लघु वनोपजों के संग्रहण और उनके कारोबार में समितियों के माध्यम से भागीदार बनाया गया है। वनों की रक्षा में जन-भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से छत्तीसगढ़ में वन विभाग के मार्ग दर्शन में संयुक्त वन प्रबंधन योजना के तहत गठित की गई सात हजार 887 समितियों में 14 लाख 36 हजार महिलाओं सहित तेरह लाख 27 हजार पुरूष भी शामिल हैं। इन सभी सदस्यों में पन्द्रह लाख 21 हजार आदिवासी, चार लाख 71 हजार अनुसूचित जाति और सात लाख 71 हजार अन्य वर्गों के लोग सम्मिलित हैं। संयुक्त वन प्रबंधन समितियों को आवंटित वन क्षेत्रों में बांस और अन्य वनोपजों के विभागीय दोहन से मिलने वाली राशि का पन्द्रह प्रतिशत लाभांश विभाग द्वारा उपलब्ध कराया जाता है, जिसे उनके खातों में जमा कर गांवों में विभिन्न प्रकार के विकास कार्य, रोजगार मूलक कार्य और वन संरक्षण से संबंधित कार्य जन-भागीदारी से कराए जा रहे हैं। अब तक इस प्रकार के 26 हजार 608 कार्य समितियों द्वारा ग्रामीणों के सहयोग से पूर्ण किए गए हैं।
अधिकारियों ने बताया कि वन प्रबंधन समितियों के गांवों में 19 हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में सिंचाई सुविधा का विस्तार किया गया है। इनमें नहर, तालाब, डबरी सहित सिंचाई बांधों में स्लूज गेट निर्माण जैसे कार्य भी शामिल हैं। मछली पालन, लाख उत्पादन, वनौषधि उत्पादन और प्रसंस्करण जैसे 431 आमदनी मूलक और अग्नि सुरक्षा तथा वन संरक्षण के दो हजार 645 कार्य भी संयुक्त वन प्रबंधन समितियों द्वारा कराए जा चुके हैं। समितियों को वन विभाग द्वारा वनों के दोहन से प्राप्त राशि में से पन्द्रह प्रतिशत के हिसाब से पिछले वर्षों के दौरान दी गई राशि से गांवों के विकास में अच्छी सफलता मिली है। विभाग द्वारा समितियों को जहां वर्ष 2001-02 में छह करोड़ तेरह लाख रूपए और वर्ष 2002-03 में आठ करोड़ 29 लाख रूपए दिए गए थे, वहीं वर्तमान में राज्य शासन द्वारा 22 करोड़ 19 लाख रूपए का प्रावधान उनके लिए किया गया है। संयुक्त वन प्रबंधन समितियों द्वारा राज्य के अनेक वन मंडलों में लघु वनोपजों के प्रसंस्करण के जरिए वनौषधियों का व्यावसायिक उत्पादन भी किया जा रहा है। इनके द्वारा तैयार च्यवनप्राश, शहद, त्रिफला, हर्बल चाय, दर्द निवारक तेल, तिखुर आदि आकर्षक पैकेजिंग के साथ राजधानी रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ लघु वनोपज व्यापार एवं विकास सहकारी संघ के विक्रय केन्द्र 'संजीवनी' में उचित मूल्य पर ग्राहकों को उपलब्ध कराए जा रहे हैं। यह केन्द्र स्थानीय जी.ई.रोड पर पुलिस मुख्यालय के सामने स्थित है।

