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छत्तीसगढ़ में एक हजार करोड़ रुपए का लघु वनोपज कारोबार

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When Nov 29, 2011
from 02:10 PM to 02:10 PM
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वनोपज व्यापार नीति बनाने राष्ट्रीय कार्यशाला : वन मंत्री ने किया शुभारंभ
स्व-सहायता समूहों को वनोपज व्यापार के लिए मिलेगा ब्याज मुक्त ऋण
वन विभाग द्वारा इस वर्ष 56.02 करोड़ रूपए का प्रावधान

रायपुर, 29 नवम्बर 2011

3881-29.11.11

वन मंत्री श्री विक्रम उसेण्डी ने कहा कि छत्तीसगढ़ में लगभग एक हजार करोड़ रूपए के लघु वनोपजों का कारोबार होता है। इनमें पांच सौ करोड़ रुपए का व्यापार तेन्दूपत्ता, सालबीज, हर्रा जैसे राष्ट्रीयकृत वनोपज और पांच सौ करोड़ रूपए का व्यापार इमली, महुआ फूल, टोरा, लाख कोसा जैसे अराष्ट्रीयकृत वनोपज शामिल हैं। श्री उसेण्डी ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा अराष्ट्रीयकृत वनोपजों के व्यवसाय में ग्रामीण्ो की भागीदारी बढ़ाने के लिए स्व-सहायता समूहों को ब्याज रहित ऋण दिया जाएगा। छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ द्वारा इसके लिए इस वर्ष 56.02 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है। प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों से सम्बध्द स्व-सहायता समूहों को यह ऋण दिया जाएगा। श्री उसेण्डी आज सवेरे यहां जेल रोड स्थित एक निजी होटल में लघु वनोपजों के व्यापार पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभांरभ करते हुए यह जानकारी दी।
कार्यशाला का आयोजन छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ और उष्णकटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान जबलपुर द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद श्री मुरारीलाल सिंह ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। कार्यशाला के शुभारंभ सत्र को  अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन विभाग) श्री नारायण सिंह, प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री धीरेन्द्र शर्मा, उष्णकटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान जबलपुर के संचालक श्री एम.एस.नेगी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) श्री रामप्रकाश ने भी सम्बोधित किया। राष्ट्रीय स्तर के इस कार्यशाला में छत्तीसगढ़ के अलावा पड़ोसी ओड़िसा, झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, वनोपज व्यवसायी और विशेषज्ञ शामिल हुए। छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ के प्रबंध संचालक श्री ए.के.सिंह ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि पूरे भारत के लगभग अस्सी प्रतिशत लघु वनोपज छत्तीसगढ़ और आसपास के प्रदेशों के जंगलों में पाए जाते हैं। ये वनोपज इनकी रोजी-रोटी से सीधे जुड़े हुए हैं। इसलिए यहां के मूल संग्राहकों को इनका लाभ दिलाने के लिए राष्ट्रीय नीति के प्रारूप बनाने के लिए इस कार्यशाला का आयोजन किया गया है।

क्रमांक-3881/पटेल

 

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