कामधेनु की तरह है बांस का महत्व-श्री दत्त
बांस गृह पर ऑडियो-वीडियो प्रदर्शन
राज्यपाल श्री शेखर दत्त से आज यहां राजभवन में कॉउंसिल फॉर सस्टनेबल डेवलपमेंट, नई दिल्ली की एक टीम ने कम्प्यूटर के माध्यम से दृश्य-श्रव्य प्रदर्शन के द्वारा अभियांत्रिकी की अवधारणाओं के अंतर्गत बांस निर्मित किफायत, मजबूत और उपयोगी आवास गृहों तथा अन्य भवनों एवं उनकी संरचनाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस संबंध में प्रदेश के कोरबा जिले के ग्राम रापाकारा में एक पायलट प्रोजेक्ट के अंतर्गत बांसों के सौ घर बनाये जा रहे हैं।
राज्यपाल श्री दत्त ने इस अवसर पर कहा कि दुनिया में बड़ी तेजी से सीमेंट बनाने में कच्चा माल के रूप में उपयोग होने वाले लाइनस्टोन की कमी होती जा रही है। आने वाले सौ सालों में ही इनकी अत्यधिक कमी हो जाएगी। ऐसे में यह जरूरी है की कांक्रीट आदि के स्थान पर ऐसे वैकल्पिक संसाधनों पर अनुसंधान किया जाय और उनका विकास किया जाय जो न सिर्फ पर्यावरण की दृष्टि से उपयोगी हो, बल्कि सस्ते हों, आसानी से सुलभ हों और लोगों को स्वीकार्य भी हो। उन्होंने कहा कि विदेशों में भी अब अमीर और साधन संपन्न लोग इमारती लकड़ी तथा बांसों के उपयोग पर जोर दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह कामधेनु का महत्व है उसी तरह बांस का महत्व है। यह अत्यंत उपयोगी है और इसके हर हिस्से का उपयोग संभव है। यह प्रकृति के वरदान की तरह है। छत्तीसगढ़ में ऐसे प्रयासों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जिससे वन क्षेत्रों के साथ-साथ बल्कि यहां के बंजर तथा अनुपयोगी क्षेत्रों में भी लगाया जा सके। इस बात का भी अध्ययन किया जाना चाहिए कि ऐसे खेतों, जिसमें धान की फसल ली जाती है उनके मेड़ों के समीप इन्हें कैसे लगाया जा सकता है ? श्री दत्त ने यह कहा कि बांसों के उपयोग को बढ़ावा दिये जाने के लिए इंस्टीटयूट ऑफ इंजीनियर्स, बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीटयूट, हुडको जैसी संस्थाओं के बीच भी हमें अधिक से अधिक तालमेल बैठाने तथा आम जनता को इसकी उपयोगिता की जानकारी दिये जाने की जरूरत है।
इस अवसर पर राज्यपाल के सचिव श्री जवाहर श्रीवास्तव भी उपस्थित थे। कॉउंसिल फॉर सस्टनेबल डेवलपमेंट, नई दिल्ली के संचालक श्री नारायण मेदुरी के नेतृत्व में आये दल ने इस संबंध में विस्तार से जानकारी दी। आई.आई.टी. नई दिल्ली से सेवानिवृत्त तथा हरिता इकोलॉजिकल इंस्टीटयूट, आन्ध्रप्रदेश के डॉ. पी. सुधाकर ने बांस के पैदावार, विभिन्न क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता, सायकल तथा रिक्शा बनाने में बांसों का उपयोग तथा बांसों के द्वारा बनाये जाने वाले विभिन्न तरह के आवास गृहों, हाल तथा स्ट्रक्चर और उनकी उपयोगिता की जानकारी दी। उन्होंने कहा जहां ऐसे घर सस्ते में बनते हैं वही यह पर्यावरण की दृष्टि से अधिक उपयोगी है। उन्होंने बताया कि बांस को हरा सोना भी कहा जाता है। उन्होंने बताया कि कोरबा जिले के रापाकारा गांव में बांसों के मकान बनाने के लिए एस.ई.सी.एल. द्वारा जमीन उपलब्ध करायी गयी है तथा डिपार्टमेंट ऑफ साईंस एण्ड टेक्नोलॉजी द्वारा वित्तीय सहायता दी जा रही है। इस अवसर पर डॉ. व्ही. एम. चेरियर, सेंटर फॉर रूरल डेव्हलपमेंट आई.आई.टी. दिल्ली तथा श्री उमेश राघव भी उपस्थित थे।

