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मध्य-पूर्व एशिया के देशों से मैत्रीपूर्ण संबंध बढ़ाने की जरूरत-श्री दत्त

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When Sep 24, 2011
from 07:00 PM to 07:00 PM
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'बदलाव की बयार में मध्य पूर्व एशिया' विषय पर व्याख्यानमाला

रायपुर, 24 सितम्बर 2011
2906-240911

        राज्यपाल श्री शेखर दत्त ने कल शाम रायपुर के न्यू सर्किट हाऊस में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनंसचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला ''बदलाव की बयार में मध्य-पूर्व एशिया'' को संबोधित करते हुए कहा कि मध्य-पूर्व एशिया के देश भारत के पड़ोसी देश है। इनमें से अधिकांश देशों के बीच केवल समुद्र है। हजारों सालों से इनके इन देशों के साथ भारत के संबंध रहे हैं। वर्तमान में इन देशों में हो रहा परिवर्तन बयार याने शांत एवं मधुर हवा की तरह नहीं है, यह आंधी की तरह है और इससे बड़ा परिवर्तन आ रहा है। इसे समझने की जरूरत है कि इन परिवर्तन से वहां तथा भारत पर क्या असर पड़ेगा तथा इन परिवर्तनों से हम क्या ग्रहण कर सकते हैं ? उन्होंने कहा कि इन परिवर्तन पर जहां नजर रखने की जरूरत है, वहीं इनके प्रति समझ बढ़ाने और इन देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बढ़ावा देने की जरूरत है। इसके लिए हमें देश की सेवाऐं की गुणवत्ता को बढ़ाने तथा उच्च शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों की संभावनाओं को मूर्त देने की आवश्यकता है, जिससे भारत निवेश की दृष्टि से एक बेहतर स्थान बन सके।
श्री दत्त ने कहा कि ऐसे व्याख्यानमालाओं का आयोजन उत्साहवर्धक है तथा जनचेतना बढ़ाने में सहायक है। मध्य पूर्व के देश पाकिस्तान की अपेक्षा भारत पर अधिक विश्वास करते हैं। इसका भारत को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष लाभ मिलता है। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में भारत का प्रो एक्टिव रोल रहा है। सोमालिया तथा लेबनान की घटनाओं से इसे समझा जा सकता है। इन देशों के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थाओं तथा स्थितियों को समझना और उनकी स्टडी करना जरूरी है।

मध्य पूर्व के देश करते हैं भारतीयों पर अधिक विश्वास - श्री अजय सिंह

      इस व्याख्यानमाला के मुख्य वक्ता भारत सरकार के भूतपूर्व सचिव तथा रक्षा एवं विदेश विषय के विशेषज्ञ श्री अजय सिंह थे। उन्होंने मध्य पूर्व एशिया के देशों के इतिहास, संस्कृति, आर्थिक विकास एवं वर्तमान परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसकी राजनीतिक एवं आर्थिक बदलाव की परिस्थितियां भारत को काफी प्रभावित करती हैं। इन देशों की आबादी में बहुत बड़ी संख्या भारतीयों की है जो वहां नौकरी आदि के लिए गये हैं। विभाजन के पहले हमारे देश की सीमा  अफगानिस्तान और ईरान से मिली हुई थी और मध्य पूर्व के साथ हमारे पुराने संबंध रहे हैं।
      मीडिल ईस्ट एशिया में इजराइल जैसे देश का उदय होना और उसके हितों की रक्षा में संलग्न पश्चिमी देशों की नीतियां इस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण रही हैं। शीत युध्द के समय दो हिस्सों में विभाजित विश्व की दो बड़ी ताकतों ने इस क्षेत्र की राजनैतिक स्थिति एवं भावी आर्थिक रणनीति को काफी प्रभावित किया। यहां मिले खनिज तेल को अपने आधिपत्य में रखने के लिए भी दुनिया के ताकतवर देशों ने प्रयास किया है। आज मध्य पूर्व एशिया में सत्तात्मक बदलाव आ रहा है और इसके प्रभाव विश्व भर में महसूस किए जा रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। सउदी अरब, ईरान, इराक, बहरीन, कुवैत, अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान जैसे देशों में होने वाली किसी भी प्रकार के हलचल की अनुभूति हमारे देश में पहले होती है। आज इन देशों में तेजी से परिवर्तन हो रहा है, इनकी आपसी लड़ाई-झगड़े में हमें फंसने की जरूरत नहीं है लेकिन इस पर नजर रखने की अवश्य जरूरत है।
     श्री अजय सिंह ने कहा कि अरब के लोग भी व्यवसायिक हैं और हमें इनके साथ आपसी व्यापार तथा मार्केट को बढ़ावा देने तथा आर्थिक संबंध बढ़ाने की जरूरत हैं। मध्य पूर्व एशिया के लोग पाकिस्तानी नागरिकों के बजाय भारतीयों की कर्मठता और विश्वसनीयता को महत्व देते हैं और इसी के बलबूते हमारे देश की प्रतिभाओं को इन देशों में कार्य करने का भरपूर अवसर मिला है। ईरान की इस क्षेत्र में विशिष्ट इतिहास एवं संस्कृत है, यह भारत को अनुदान तथा क्रेडिट में तेल प्रदान करता है। तीसरी ताकत के रूप में यहां चीन अपनी ताकत बढ़ा रहा वह यहां के देशों को हथियार भी देता है। उसकी सोच  भारतीय उत्पादों को कम करने की रहती है। ऐसे में हमें यह सोचने की जरूरत है कि इस इसका इलाज क्या है ? हालांकि अरब देशों की सद्भावना चीन एवं पाकिस्तान की अपेक्षा भारत के साथ अधिक है।
    व्याख्यान के उपरांत बड़ी संख्या में लोगों ने प्रश्न पूछे तथा अपनी जिज्ञासाओं का समाधान किया। एक प्रश्न के उत्तर में राज्यपाल ने कहा कि चीन के अप्रवासी निवासियों द्वारा विदेशों से पर्याप्त मात्रा में भेजे जाने वाले धन का निवेश भी चीन के आगे बढ़ने का एक बड़ा कारण है। प्रश्नों का उत्तर देते हुए श्री अजय सिंह ने कहा कि अरब के बाजारों के लिए हमें हिन्दुस्तान को आकर्षक बनाना होगा। पाकिस्तान में लोकतंत्र की संभावना और उसके भारत के साथ संबंधों के प्रश्न पर श्री अजय सिंह ने कहा कि वहां की सामाजिक परिस्थिति में सेना शीर्ष पर है और उसके द्वारा निर्धारित नीतियों से शासन चलता है। वहां की आर्मी की नीति केवल भारत विरोधी की रही है। वहां के बच्चों को इतिहास और संस्कृति की समुचित जानकारी नहीं दी जाती। महंगाई के मुद्दे पर पूछे गये सवाल का जवाब देते हुए श्री सिंह ने कहा कि इन देशों में वहां की सरकार द्वारा अच्छी चिकित्सा, शिक्षा एवं उच्च अनुदान सहायता जन-सामान्य को प्रदान की जाती है और इससे महंगाई नियंत्रित रहते है।
      राज्य के अपर मुख्य सचिव श्री सुनील कुमार ने कहा कि 11 सितम्बर की घटना के बाद से अमेरिका आदि देशों में काफी परिवर्तन आया है। मध्य पूर्व एशिया के देशों के युवा यहां के विश्वविद्यालयों में पढ़ने जाते थे तथा इससे अमेरिका के विश्वविद्यालय को अच्छी आय होती थी। लेकिन अब विद्यार्थी यहां स्वतंत्रतापूर्वक नहीं जा पा रहे हैं। इसका फायदा भारत के उच्च शिक्षा के संस्थानों को उठाना चाहिए तथा ऐसे कैम्पस बनाये जाने चाहिए जिसमें उच्च गुणवत्ता की शिक्षा सुलभ हो।
     इससे पहले कुशाभाउ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने स्वागत भाषण दिया और विषय वस्तु की जानकारी प्रदान की। उन्होंने कहा कि महामहिम राज्यपाल के मार्गदर्शन में बुध्दिजीवियों के बीच वैचारिक मंथन की प्रक्रिया जारी रखने का प्रयास है।
        इस अवसर पर दिशा इंस्टीटयूट के चेयरमेन श्री सुरेन्द्र जैन ने व्याख्यानमाला का प्रस्तावना प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व एशिया के देशों की अनुपजाऊ मिट्टी के बावजूद खनिज तेल जैसा कीमती एवं उत्कृष्ट संसाधन इन देशों को मिला है। यह ऐसी देशों की भूमि है जहां विश्व के अनेक धर्मों और सार्वभौमिक संस्कृतियों का जन्म हुआ। इस कारण यहां चलने वालीे किसी भी प्रकार की बयार और आंधी से विश्व के देश प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते। इन देशों की खुशहाली का सीधा संबंध हमारे देश की खुशहाली पर निर्भर है क्योंकि हमारे देश का एक बड़ा व्यापार इन देशों से होता है। कार्यक्रम के अंत में कुलसचिव श्री डी.एन. वर्मा ने आभार व्यक्त किया।

    क्रमांक- 2906/पंकज/शुक्ल
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