लियेंडर पेस ने राज्यपाल से मुलाकात की लगभग दो दशक बाद फिर शुरू हुआ गोंडवाना कप राष्ट्रीय टेनिस टूर्नामेंट:मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने किया शुभारंभ मंत्रिपरिषद की बैठक : छत्तीसगढ़ में गौ हत्या पर अब और अधिक कठोर कारावास हीरानार नल-जल योजना के लिए 19.42 लाख रूपए स्वीकृत ग्राम कुथुर के लिए नल-जल योजना स्वीकृत उर्दू अकादमी में अध्यक्ष-उपाध्यक्ष सहित सदस्यों का मनोनयन मुख्यमंत्री ग्राम उत्कर्ष योजना : अब तक 153.40 करोड़ की लागत के सात हजार से ज्यादा विकास कार्य पूर्ण सक्षम योजना : राज्य की 284 महिलाओं को स्वरोजगार के लिए मिला 1.62 करोड़ रूपए का ऋण ग्राम पंचायतें अब दस लाख रूपये तक के निर्माण कार्य कर सकेंगे कमरौद स्कूल का नामकरण अहिल्या बाई त्रेतानाथ के नाम पर गलफुल्ला और चनान नदी पर बनेंगे उच्च स्तरीय पुल मुख्यमंत्री से मध्यप्रदेश के कृषि मंत्री श्री बिसेन की सौजन्य मुलाकात मुख्यमंत्री से अभनपुर नगर पंचायत के प्रतिनिधि मण्डल की मुलाकात श्री केदार कश्यप से पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य श्री शिव चन्द्राकर ने सौजन्य मुलाकात की उपार्जन केन्द्रों में तेजी से हो रही धान की आवक श्रम मंत्री श्री साहू की अध्यक्षता में असंगठित श्री केदार कश्यप के नेतृत्व में प्रतिनिधि मंडल नई दिल्ली प्रवास पर आज करेंगे केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री से मुलाकात कृषि मंत्री श्री साहू ने किया खारून नदी पर एनीकट सह रपटे का भूमिपूजन राज्यपाल से सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक ने सौजन्य मुलाकात की मुख्यमंत्री के समक्ष जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन पर प्रस्तुतिकरण मुख्यमंत्री से सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक ने सौजन्य मुलाकात की

Personal tools
You are here: Home समाचार राज्यपाल प्रकृति को बचाने की जंग जीतनी ही होगी-श्री शेखर दत्त

प्रकृति को बचाने की जंग जीतनी ही होगी-श्री शेखर दत्त

What
When Nov 17, 2010
from 05:20 PM to 05:20 PM
Add event to calendar vCal
iCal

'छत्तीसगढ़ के कृषि विकास में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव' विषय पर संगोष्ठी

रायपुर, 17 नवम्बर 2010
3777-1-171110
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री शेखर दत्त ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले दुष्प्रभावों से बचने के लिए हमें पूरे विश्व को एक साथ समग्र रूप से देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि प्रकृति को बचाने तथा जलवायु परिवर्तन के कुप्रभावों से बचने के लिए लड़ी जा रही जंग हमें हर हालत में जीतनी ही होगी। इसके लिए शासन इसके सभी विभागों, संगठनों, किसानों और नागरिकों को एकजुट होकर योजनाबध्द तरीके से काम करने की आवश्यकता है। इस जंग में बीच की स्थिति संभव नहीं है। अगर किसी कारणवश हम असफल होते हैं, तो पूरी दुनिया को दुर्दिन देखने पड़ेंगे।
    राज्यपाल ने इस आशय के विचार आज यहां इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय परिसर में छत्तीसगढ़ एग्रोटेक सोसायटी तथा कृषि विस्तार एवं प्रशिक्षण संस्थान (समेती) के संयुक्त तत्वाधान में छत्तीसगढ़ के कृषि विकास में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव विषय पर आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त किए। राज्यपाल ने कहा कि धरती के 'ग्रीन कवर' को बनाये रखना बहुत जरूरी है। इसके लिए कृषि के साथ-साथ फूलों और औषधीय फसलों3777-2-171110 की खेती, पशुपालन, मत्स्य पालन और सामाजिक वानिकी के समन्वित प्रयासों से जमीन के सदुपयोग करने और जंगल को बचाये रखना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि जमीन को रिहायशी, कृषि, औद्योगिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में वर्गीकरण्ा तो दिया जाता है, लेकिन वेस्ट लैण्ड (अनुपयोगी बंजर जमीन) के विकास की ओर समुचित ध्यान दिया जाता। पूरे देश में 60 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में अनुपयोगी बंजर क्षेत्र है। इस पर चिंतन होना चाहिए कि इसे कैसे उपयोगी तथा 'ग्रीन' बनाया जाये।
    राज्यपाल ने जल, जमीन और जंगल की सुरक्षा और रक्षा के लिए प्रबंधन पर विशेष जोर दिया। उन्होंने संगोष्ठी में कृषि मंत्री द्वारा सुझाये छह 'ज' (6 जे) जल, जमीन और जंगल के साथ जानवर, जलवायु और 'जन' की अवधारणा की भी तारीफ की। राज्यपाल ने कहा कि छत्तीसगढ़ में 73 प्रतिशत लोग खेती से जुड़े हैं। ईश्वर ने यहां लोगों को अच्छी जमीन दी है, अच्छा पानी दिया है और आबादी भी कम है। इस तरह प्रति व्यक्ति अधिक जमीन उपलब्ध है। जरूरत इस बात की है कि जमीन का विवेकपूर्ण तरीके से सदुपयोग भविष्य में भी होता रहे। जमीन तथा 'ग्रीनरी' का अनुपात कम नही हो पाये। उन्होंने अमेरिका तथा यूरोप का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां का औद्योगिकीकरण हमारे यहां से सैकड़ों गुना अधिक है, लेकिन उन्होंने शहरों के वर्टिकल (उर्ध्वाधर) विकास पर जोर दिया है, जिससे अधिक से अधिक जमीन ग्रीन या कृषि के लिए सुरक्षित रहे। राज्यपाल ने छत्तीसगढ़ के किसानों को तीन फसल लेने, कृषि के नये साधन अपनाकर उत्पादकता बढ़ाने, आमदनी बढ़ाने तथा बाजार से जुड़ने का आव्हान किया। उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों से कहा कि कोदो, कुटकी, रागी जैसे लघु धान्य के गुणों को उजागर करते हुए ऐसे अनुसंधान करें, जिससे इन्हें व्यावसायिक रूप से उत्पादन लिया जा सके। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों और वहां के लोगों के जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार लाने पर भी जोर दिया। इससे पहले राज्यपाल श्री दत्त ने देवउठनी (एकादशी) के अवसर पर आयोजित संगोष्ठी का शुभारंभ तुलसी के पौधों के समक्ष दीप प्रज्जवलित करके दिया।
    संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कृषि मंत्री श्री चन्द्रशेखर साहू ने कहा कि प्रदेश में कृषि की बेहतर स्थिति के लिए जल, जंगल, जमीन, जन, जलवायु और जानवर इन सभी को समग्र एवं व्यापक परिदृश्य में रखकर सोचने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में धान की खेती हमारी संस्कृति से जुड़ी है। यहां जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ कृषि परिदृश्य में भी परिवर्तन आया है और लोगों ने इसे महसूस किया है। प्रदेश के राजनांदगांव, कवर्धा, दुर्ग की धमधा एवं बेमेतरा जैसे क्षेत्रों में सोयाबीन एवं अन्य अन्तरवर्ती फसलें भी ली जा रही हैं। इन जलवायु परिवर्तनों को कृषिगत फसलों के अनुकूल ढालकर खेती को और अधिक अच्छा बना सकते हैं। श्री साहू ने प्रदेश के युवाओं को कृषि क्षेत्र से जोड़ने का आग्रह किया और कहा कि कृषि संस्कृति को बढ़ाकर लोगों को रोजगार से जोड़ सकते हैं। मंत्री श्री साहू ने कहा कि यह कृषि क्षेत्र की ही देन है कि आज देश में सबसे अधिक राज्य का जी.डी.पी. 11.94 प्रतिशत है। श्री साहू ने संगोष्ठी के विषय को सर्वकालिक एवं ज्वलंत बताया और कहा कि इस पर व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता है। उन्होंने कृषि के पारम्परिक ज्ञान, कौशल के संरक्षण पर बल दिया और कहा कि कृषि विकास के लिए दीर्घकालिक प्रोजेक्ट की जरूरत है। कृषि मंत्री ने कहा कि प्रदेश के किसान खेती के पारम्परिक ढंगों के साथ-साथ उत्पादित होने वाले फसलों की पोषण्ा क्षमता, उनकी विशेषताओं को भलीभांति जानते हैं और उसी के अनुरूप कृषि भी करते हैं। उन्होंने ऊर्जा उत्पादन के गैर-परम्परागत स्रोतों को बढ़ाने, इनके उत्पादन में बेहतर तकनीक की इस्तेमाल करने और संसाधनों के समुचित उपयोग करने पर जोर दिया।
    छत्तीसगढ़ राज्य बीज एवं कृषि विकास निगम के अध्यक्ष श्री श्याम बैस ने कहा कि छत्तीसगढ़ एग्रोटेक सोसायटी प्रदेश के किसानों के हित में काम करती है। आज जलवायु परिवर्तन के कारण कृषि भी प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग की समस्या एक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है और इसके दुष्परिणामों पर सोचने, विचार-विमर्श करने एवं समस्या से निदान पाने की दिशा में कार्य करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि राज्य में किसान रासायनिक खादों के साथ-साथ जैविक खाद का उपयोग कृषिगत कार्यों में अधिकाधिक करें।
संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री ललित सिंघानिया ने जलवायु परिवर्तन के कारकों में औद्योगिकीकरण और मीथेन फारमेशन को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि इसका प्रभाव कृषि पर पड़ा है। मौसम वैज्ञानिक श्री शास्त्री ने छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में हो रही वर्षा की कमी और बढ़ोत्तरी, तापमान में वृध्दि, मानसून के आगमन के समय में अन्तर, धान की पुरानी प्रजातियों की विलुप्तता इत्यादि विषयों पर विस्तार से जानकारी दी और कहा कि इसके लिए आंकड़ों के संकलन एवं उसके विशेष अध्ययन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। क्रेडा के संचालक श्री एस.के. शुक्ला ने प्रदेश में ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए परम्परागत स्रोतों के स्थान पर गैर-परम्परागत स्रोतों के इस्तेमाल पर जोर दिया और कहा कि नवीनतम तकनीकों के माध्यम से लोगों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।
    संगोष्ठी में श्री अजय झा ने जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित देशों में अधिक औद्योगिकीकरण एवं उनकी उपभोक्तावादी जीवन शैली को कारक बताया और कहा कि हमारे देश में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को रोकने के उपाय अपनाने चाहिए। इसके लिए कृषि विश्वविद्यालयों को भी ध्यान देना होगा। उत्तराखण्ड से आये प्रमुख पर्यावरणविद श्री विजय नेगी ने जलवायु परिवर्तन को एक संकट की संज्ञा दी और कहा कि 65 हजार वर्षों में तापमान में जितनी बढ़ोत्तरी हुई है उससे अधिक बढ़ोतरी विगत 200 वर्षों के औद्योगीकरण के फलस्वरूप हुई है। छत्तीसगढ़ एग्रोटेक सोसायटी के अध्यक्ष प्रोफेसर मनहर आडिल ने अतिथियों का स्वागत किया और संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। प्रशिक्षण अकादमी (समेती) के संचालक श्री सी.एल. जैन ने आभार प्रदर्शन किया।
क्रमांक-3777/पंकज

 

« May 2012 »
May
MoTuWeThFrSaSu
123456
78910111213
14151617181920
21222324252627
28293031