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समग्र विकास के लिए ''बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय'' का चिन्तन सर्वश्रेष्ठ-श्री शेखर दत्त

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When Apr 27, 2011
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तिल्दा में स्वयंसेवी संगठनों की परिचर्चा में राज्यपाल का उद्गार

रायपुर, 27 अप्रेल 2011

छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री शेखर दत्त ने कहा है कि भारत एक विशाल एवं भिन्न-भिन्न विशेषताओं से भरा देश है, जहां विभिन्न समुदायों, संस्कृतियों, भाषा-बोली के लोग आपसी भाईचारे से रहते हैं। यहां के अलग-अलग क्षेत्रों, वर्गों और समुदायों की समस्याएं अलग-अलग है जिनके समाधान का एक हल (सल्यूशन) नहीं हो सकता। यहां के समन्वित विकास के लिए ''बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय'' का चिन्तन ही सर्वश्रेष्ठ है।  464-270411
राज्यपाल श्री दत्त ने अपने ये उद्गार कल शाम रायपुर जिले के तिल्दा-नेवरा में एकता परिषद द्वारा आयोजित एक परिचर्चा में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि हमारे विशाल एवं व्यापक देश में विकास के लिए लोकतंत्र ही सर्वश्रेष्ठ रास्ता है और इसका कोई विकल्प नहीं है। आज हमारे देश में भारतीयों का ही शासन है और अब शासक और शासित जैसी बात नहीं कही जानी चाहिए। हमारे देश और लोकतंत्र को सफल बनाने की जिम्मेदारी हम सभी लोगों की है। इसकी कमियों और समस्याओं को संवाद के माध्यम से दूर किया जा सकता है। राज्यपाल ने गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों का स्मरण करते हुए कहा कि अंतिम छोर की कड़ी भी सशक्त हो, उनमें धैर्य और अनुशासन हो तभी देश समग्र रूप से आगे बढ़ेगा। श्री दत्त ने इस संबंध में स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए प्रगतिशील तरीकों से लोगों को संगठित किया जाना चाहिए तथा इसमें रचनाधर्मिता भी होनी चाहिए। यह भी जरूरी है कि कोई भी समुदाय उद्वेग तथा आवेश में आकर कोई गलत कार्य न करे। देश में हाल ही में आये भूकंप, सुनामी और उसके बाद परमाण्0श्निवक कठिनाईयों के बाद भी जिस तरह वहां के लोगों ने अनुशासन और धैर्य से देश के लिए कार्य किया वह एक अच्छा उदाहरण है। हमारे देश की आजादी को बरकरार रखने और सफल बनाने की जिम्मेदारी भी हम सभी की है।

द्वितीयक तथा तृतीयक क्षेत्रों से जुड़े अधिक से अधिक लोग

राज्यपाल श्री दत्त ने कहा कि हमारे देश की 60 प्रतिशत आबादी अभी भी कृषि पर अर्थात् प्राथमिक क्षेत्र पर निर्भर है जबकि राष्ट्रीय आय में कृषि का योगदान मात्र 25 प्रतिशत है। इस तरह कृषि पर जनसंख्या का अधिक दबाव है किन्तु प्रति व्यक्ति योगदान कम है। हमारा प्रयास होना चाहिए कि कृषि क्षेत्रों के उत्पादों का जहां वेल्यू एडीशन हो वही द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रों अर्थात् सेवा, व्यवसाय और उद्योग से भी अधिक से अधिक लोग जुड़ें।
श्री दत्त ने कहा कि को-ऑपरेटिव सोसायटियों के माध्यम से सफलता अर्जित करने का 'अमूल' के रूप में अच्छा उदाहरण है। इसकी कड़ियों के रूप में लाखों लोग जुड़े हैं और लाभान्वित हो रहे हैं। हमारे राज्य में भी तेंदूपत्ता संकलन की कुछ ऐसी ही व्यवस्था है जिसमें बिक्री के बाद तेंदूपत्ता संग्राहकों को बोनस के रूप में राशि बांटी जाती है। ऐसी योजनाओं के फैलाव, व्यापकता और सफलता के लिए जरूरी है कि ग्राम सभा लोगों को संगठित कर को-ऑपरेटिव बनाये तथा इसे व्यावहारिक रूप दें। राज्यपाल ने इसी दिशा में स्व-सहायता समूहों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया और कहा कि इसके लिए आवश्यकता के अनुरूप अनेक गांवों के लिए एक, एक गांव के लिए एक या एक गांव में कई स्व-सहायता समूह बनाये जाने चाहिए।
राज्यपाल ने कहा कि पूरा विश्व एक परिवार की तरह है। इसमें आदर्श स्थिति तभी है जब हर एक व्यक्ति उपभोक्ता के साथ-साथ उत्पादक भी बने। विकसित देश इस दिशा में अधिक सफल है। इन देशों में औद्योगीकरण का कार्य काफी उथल-पुथल, श्रम तथा मेहनत के उपरांत सफल हुआ। श्री दत्त ने कहा कि उपभोक्ता के पास जहां पैसा होना चाहिए वहीं उत्पादक के पास एसेट (सम्पदा) होनी चाहिए। हमारे राज्य में सम्पदा के रूप में खनिज, वन और कृषि है। इन सम्पदाओं का दोहन ऐसे होना चाहिए जिसमें लोगों की आमदनी बढ़े तथा इनके लाभ आम लोगों को मिले। उन्होंने कृषि के विकास के लिए आधिक्य उत्पाद के फूड प्रोसेसिंग करने, बाजार के अनुरूप व्यावसायिक फसल लेने तथा एक फसल के स्थान पर दो और तीन फसल लेने पर जोर दिया। उन्होंने इसी तरह खनिज सम्पदाओं के विकास के लिए स्थानीय स्तर पर ही इसके वेल्यू एडीशन दिये जाने पर जोर दिया।

निवासियों में अवसरों को ग्रहण करने की शक्ति बढ़े

श्री दत्त ने कहा कि यह जरूरी है कि राज्य के निवासियों में अवसरों को ग्रहण करने की शक्ति बढ़े। इसके लिए राज्य के बच्चे तथा युवा अच्छी पढ़ाई-लिखाई करें तथा तकनीकी दृष्टि से प्रशिक्षण और कौशल प्राप्त करें। इसी तरह बस्तर के विकास के लिए यह बेहद जरूरी है कि वहां के बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में किसी तरह की बाधा नहीं पहुंचे तथा वे भी कौशल तथा तकनीकी दृष्टि से प्रशिक्षित हो। श्री दत्त ने कहा कि पिछले वर्ष अबूझमाड़ क्षेत्र से पहले विद्यार्थी का प्रवेश मेडिकल कॉलेज के लिए हुआ है। इस बात की जरूरत है कि विशेष रूप से पिछड़े आदिवासियों का रूझान पढ़ाई-लिखाई में बढ़े तथा हम उन्हें ऐसा माहौल दे सके कि जिससे उनके भी बच्चे इसी तरह आगे बढ़ सके। श्री दत्त ने स्वयंसेवी संगठनों से कहा कि विचारों पर मतभेद हो सकते हैं किन्तु इनका प्रभाव बच्चों के भविष्य पर नहीं पड़ना चाहिए।
राज्यपाल ने कहा कि लोगों को सिर्फ उपभोक्ता नहीं बने रहना चाहिए। आर्थिक गतिविधियों से भी अधिक से अधिक व्यक्ति को जुड़ना चाहिए तथा बाजार में उपलब्ध ऐसे उत्पाद जिनका निर्माण ग्राम, विकासखण्ड तथा जिला स्तर पर हो सकता हैं, उन्हें स्थानीय स्तर से उत्पादित किए जाने के प्रयास होने चाहिए, जिससे उपलब्ध कच्चे माल को फिनिश प्रोडक्ट के रूप में बदलने में सफलता मिलेगी। इसके लिए जरूरी है कि संसाधन को भी इसके अनुरूप कुशल और प्रशिक्षित बनाया जाये। उन्होंने कहा कि देश के विकास के लिए औद्योगीकरण भी जरूरी है। इससे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिल सकता है। ऐसे प्रयास होने चाहिए कि देश का हर व्यक्ति अच्छा उपभोक्ता और अच्छा उत्पादक दोनों बने। श्री दत्त ने यह भी कहा कि चीन देश ने अपने आपको  कृषि के क्षेत्र से औद्योगिक क्षेत्र के रूप में बदला है। इससे भी सीख लेने की जरूरत है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में राष्ट्रीय एकता परिषद के अध्यक्ष श्री राजगोपाल ने परिचर्चा की रूपरेखा पर व्यापक प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि महात्मा गांधी के सिध्दांतों के अनुरूप उनका संगठन अंतिम व्यक्ति को राहत दिलाने के लिए प्रयास कर रहा है। उन्होंने स्वयंसेवी संगठन के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ाने, सामाजिक बुराईयों को दूर करने, जल के संरक्षण, चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार, शराबबंदी, भूमि सुधार तथा वनाधिकार आदि क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हम सभी चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ राज्य अमन-चैन का क्षेत्र बने। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में पांचवी अनुसूची का क्षेत्र है जिसमें महामहिम राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने राज्यपाल श्री दत्त के चंबल क्षेत्र में कलेक्टर के रूप में डाकुओं की समस्या दूर करने तथा क्षेत्र में शांति लाने की भूमिका का भी स्मरण किया।
कार्यक्रम का संचालन श्री रमेश शर्मा ने किया। उन्होंने बताया कि स्वयंसेवी संस्थाओं और संगठनाों की तीसरी परिचर्चा है। इसमें राज्य के ग्रामीण अंचलों में स्वरोजगार की संभावना, भूमि विकास तथा लघु वनोपज आधारित उद्यम, जैविक खेती, बुनकर तथा शिल्प उद्यम के माध्यम से स्वरोजगार और स्वावलंबन की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है। इसी तरह पांचवी अनुसूची के तहत चिन्हित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार उपबंध अधिनियम (पेसा 1996) पर भी चर्चा की जा रही है। 

परिचर्चा में पूर्व विधायक श्री जनकलाल ठाकुर ने कहा कि प्रदेश आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सुविधाओं का समुचित विस्तार किया जाना चाहिए। आदिवासियों के कल्याण के लिए बनाई जाने वाली योजनाओं में आदिवासियों के वनाधिकार, जल जमीन, रोजगार, कृषि योग्य भूमि, प्रशिक्षण तथा रोजगार की सुविधा का ध्यान विशेष रूप से रखा जाना चाहिए। आदिवासी क्षेत्रों में लघु वनोपज एकत्र, संग्रहण एवं विक्रय के लिए अनेक केंद्र स्थापित किया जाना चाहिए।
परिचर्चा के दौरान श्री सीताराम सोनवानी ने सिकासार जलाशय के लिए बेदखल परिवारों को क्षतिपूर्ति राशि दिलाने का आग्रह किया। श्री राम गुलाब ने वन अधिकार पत्रों का और अधिक विस्तार करने पर बल दिया। उन्होंने लघु वनोपज के लिए समर्थन मूल्य घोषित करने तथा उचित बाजार व्यवस्था की भी बात कही। श्रीमती लता ने वन अधिकार अधिनियम एक्ट से सामुदायिक दावा के द्वारा लोगों को लाभान्वित करने पर बल दिया। श्री कृष्णा सिन्हा ने आदिवासी क्षेत्रों के लिए पेसा अधिनियम को लागू किए जाने पर बल दिया। परिचर्चा में श्री रणवीर सिंह एवं श्री शुक्ला ने एम.ओ.यू. के पहले जन-सुनवाई करने, खनिज खनन के लिए को-ऑपरेटिव बनाने तथा जल-संसाधन बढ़ाने पर जोर दिया। इसी तरह रोहणी तथा जानकी ने गुजरात के तर्ज पर छत्तीसगढ़ में शराबबंदी करने पर बल दिया।

 

क्रमांक 464 /पंकज/शुक्ल



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