मीडिया शिक्षा श्रेष्ठता के शिखर को स्पर्श करे - श्री दत्त
मीडिया शिक्षा के पाठयक्रम को अखिल भारतीय स्तर पर नियमन करने की जरूरत
''मीडिया शिक्षा : भविष्य एवं दिशा'' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी प्रारंभ
रायपुर, 5 मई 2011
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री शेखर दत्त ने कहा है कि आज जरूरत है कि सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़कर मीडिया शिक्षा के क्षेत्र में अद्यतन मापदंड स्थापित किया जाये जिससे यह श्रेष्ठता के शिखर को छू सकें। मीडिया शिक्षा में ज्ञान, निरीक्षण और विश्लेषण तथा अभिव्यक्ति की क्षमता को बढ़ाना होगा। इन तीन गुणों से युक्त पत्रकार या मीडिया कर्मी जहां कहीं भी जायेंगे अपनी छाप छोडेंगे। मीडिया शिक्षा के लिए आज योग्य और दक्ष फैकल्टी का उपलब्ध होना एक चुनौती है। जैसे-जैसे मीडिया पाठयक्रमों की लोकप्रियता बढ़ रही है, अध्यापन के लिए अनुभवी शिक्षकों की मांग भी बढ़ रही है। लेकिन समस्या अकादमिक और व्यावहारिक ज्ञान दोनों में दक्ष व्यक्तियों की है। मीडिया शिक्षा को वर्तमान के साथ तालमेल बैठाते हुए उचित पाठयक्रम के अनुसार संचालित करने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर नियमन करने की भी आवश्यकता है।
राज्यपाल श्री दत्त ने अपने यह उद्गार आज यहां कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा ''मीडिया शिक्षा-भविष्य एवं दिशा'' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के शुभारंभ सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जी.एन. रे ने की। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ विधानसभा अध्यक्ष श्री धरमलाल कौशिक उपस्थित थे। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति श्री बी.के. कुठालिया भी विशेष रूप से मंच पर उपस्थित थे।
अपने संबोधन में राज्यपाल श्री दत्त ने कहा कि ज्ञान को प्राप्त करने के लिए मीडिया शिक्षा के विद्यार्थियों को बहुत मेहनत करने की जरूरत है। निरीक्षण और विश्लेषण की क्षमता को धीरे-धीरे अनुभव के आधार पर विकसित किया जा सकता है और फिर ज्ञान के आधार पर किये गये निरीक्षण और विश्लेषण से अभिव्यक्ति की योग्यता को भी विकसित किया जा सकता है। उन्होंने नवीनतम टेक्नोलॉजी तथा प्रबंधकीय ज्ञान से मीडिया के विद्यार्थियों को सबल बनाने पर जोर दिया।
राज्यपाल ने कहा कि पत्रकारिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा लोकतंत्र किसी न किसी रूप में भारत में बहुत पहले से अस्तित्व में था। जब भारत में समाचार पत्रों का प्रकाशन आरंभ हुआ तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आदर्श स्थापित हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में समाचार पत्रों ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत के महानतम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महात्मा गांधी और उनके साथ लोकमान्य तिलक व जवाहर लाल नेहरू भारत के महान पत्रकार भी माने गये हैं। भारत में पत्रकारिता विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ यहां सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्वतंत्रता, समानता और न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य कर रही है। लोकतंत्र के विस्तार और सूचना युग के कारण आये परिवर्तनों के कारण आज मीडिया ने प्रभावशाली तंत्र का स्थान प्राप्त कर लिया है।
श्री दत्त ने कहा कि आजादी के समय और आजादी के कुछ दशकों तक पत्रकारिता एक मिशन थी लेकिन अब वह एक व्यावसायिक उपक्रम का रूप ले रही है। इस कारण पत्रकारिता और मीडिया पर कुछ आरोप भी लगते है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए मीडिया द्वारा किया गया प्रयास एक मिशन होता है, और नवीनतम तकनीकी ज्ञान तथा प्रबंधन की आवश्यकता के अनुरूप समाचार पत्रों का प्रकाशन या मीडिया और सोशल मीडिया से प्रसारण एक प्रोफेशनल कार्य है। इससे आगे बढ़कर यदि कोई अन्य आर्कषण मीडिया को प्रभावित करें तो यह गैर-प्रोफेशनल बात है।
श्री दत्त ने कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी ने जो परिवर्तन किये हैं उससे जनसंचार के तंत्र में भारी बदलाव आया है और कुछ दशक पहले तक आधुनिक माने जाने वाले समाचार पत्र याने की प्रिंट मीडिया और टेलीविजन आदि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अब पारम्परिक संचार माध्यम माना जाने लगा है। हाल ही के कुछ सप्ताहों में मिडिल ईस्ट में जो राजनीतिक आंदोलन हुए और भारत में भ्रष्टाचार के विरूध्द जो जनजागृति अभियान चलाया गया, उसमें न्यू सोशल मीडिया की भूमिका सर्वोपरि मानी गयी है।
श्री दत्त ने मीडियाकर्मियों से आग्रह किया कि ग्रामीण अंचलों के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास के लिए उत्प्रेरक का कार्य करें। यह बेहद जरूरी है कि मीडिया की पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़े, जिससे यहां के लोगों को सामाजिक-आर्थिक उन्नति के अवसरों का ज्ञान मिल सकें और वे उन अवसरों का लाभ ले सकें। इससे देश की मुख्यधारा के साथ उनका जीवंत और सतत संपर्क बनेगा और देश में समावेशी तथा समान विकास संभव हो सकेगा।
भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जी.एन. रे ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्रजातंत्र में प्रेस को चौथे स्तंभ के रूप में देखा जाता है और यह प्रजातंत्र को मजबूत करने में लगा हुआ है। आज पत्रकारिता के क्षेत्र में अनेक बदलाव आये हैं। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और गोपालकृष्ण गोखले की पत्रकारिता के क्षेत्र में किये गये कार्यों का उन्होंने उल्लेख किया तथा मीडिया के इतिहास उसके विभिन्न कालों के परिवर्तन रूपों और वर्तमान मीडिया के वैश्विक स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि मीडिया की भूमिका अब काफी बढ़ गयी है। वर्तमान जरूरतों को देखते हुए उन्होंने पत्रकारिता तथा जनसंचार के पाठयक्रमों को अद्यतन करने पर उन्होंने जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि पत्रकारिता से जुड़े मीडियाकर्मियों को देश के इतिहास, भूगोल और सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश का समुचित ज्ञान होना जरूरी है।
विधानसभा अध्यक्ष श्री धरमलाल कौशिक ने कहा कि मीडिया शिक्षा केवल भरण-पोषण के लिए नहीं है बल्कि वह नागरिकर् कत्ताव्यों का बोध कराती है और समाज तथा राष्ट्र के निर्माण का अवसर प्रदान करती है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान करने वाले श्री माधवराव सप्रे की भूमिका का उल्लेख किया और कहा कि आज मीडियाकर्मियों के लिए वे प्रेरणा स्रोत्र हैं। श्री कौशिक ने कहा कि शिक्षण, प्रशिक्षण से व्यक्ति की नैसर्गिक प्रतिभा निखरती है।
माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति श्री बी.के. कुठालिया ने कहा कि आज हमारे देश के साथ-साथ मीडिया भी संक्रमण काल से गुजर रहा है। कई बार यह दिशा-विहीन दिखती है। ऐसे में यह जरूरी है कि मीडिया में काम करने वाली नई पीढ़ी न केवल संस्कारिक हो बल्कि उनमें समाज के प्रति दायित्वबोध भी बना रहे। मीडिया में भाषा की शुध्दता बनाये रखना जरूरी है क्योंकि मीडिया समाज की भाषा को बनाती है। उन्होंने कहा सोशल मीडिया के रूप में नया मीडिया सामने आ रहा है, जो पारंपरिक मीडिया के अपेक्षा ज्यादा प्रजातांत्रिक, जिम्मेदार और खुलापन लिए हुए है, लेकिन इसकी भी दशा तय करने के लिए नियमन जरूरी है। उन्होंने कहा कि आज मीडिया प्रबंधन के क्षेत्र में प्रबंधन की शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थी अधिक आ रहे है। यह जरूरी है कि मीडिया शिक्षा के विद्यार्थियों के लिए भी मैनेजमेंट की शिक्षा प्रदान की जाए। उन्होंने उम्मीद व्यक्त की कि राष्ट्रीय संगोष्ठी से मीडिया शिक्षा को और बेहतर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण सुझाव मिलेंगे।
इससे पहले कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति श्री सच्चिदानंद जोशी ने स्वागत भाषण में संगोष्ठी के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज बड़ी संख्या में युवा वर्ग पत्रकारिता को कैरियर बनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता एवं जनसंचार की शिक्षा प्रदान की जाती है। इन पाठयक्रमों में एकरूपता रहे, मीडिया शिक्षा के मापदंड को उंचा उठाया जाए तथा विद्यार्थियों में पुस्तकीय ज्ञान के अलावा व्यवहारिक ज्ञान बढ़ाया जाए ऐसे अनेक विषयों पर संगोष्ठी के माध्यम से चर्चा की जा रही है। यह भी विचार करने की जरूरत है मीडिया शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए क्या किसी प्रकार से नियामक संस्था की जरूरत है। कार्यक्रम के अंत में कुल सचिव श्री देवेन्द्रनाथ वर्मा ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर देश के विभिन्न भागों से आये मीडिया वरिष्ठ पत्रकारगण, मीडिया शिक्षा से जुड़े लोग तथा छात्रगण उपस्थित थे।

