भारतीय चिकित्सा पध्दतियों का आकर्षण दिल के साथ दिमाग को भी छुए - श्री शेखर दत्त
आयुष वनौषधियों के प्रबंधन और सुदृढ़ीकरण पर कार्यशाला का शुभारंभ
राज्यपाल श्री शेखर दत्त ने आज यहां नवीन विश्राम गृह में आयुष वनौषधियों के समुचित प्रबंधन और सुदृढ़ीकरण नीति बनाने संबंधी दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि आज से करीब दो सौ-तीन सौ वर्ष पूर्व शोध एवं अनुसंधान पर आधारित आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा पध्दति का विकास हुआ। यह चिकित्सा पध्दति प्राचीन चिकित्सा पध्दतियों की बुनियाद और आधार पर ही विकसित हुई है। आज इस बात की जरूरत है आयुष के अंतर्गत आने वाले आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिध्द और होम्योपैथी आदि सभी परम्परागत चिकित्सा क्षेत्रों में भी शोध एवं अनुसंधान को व्यापक रूप से बढ़ावा दिया जाय, जिससे भारतीय चिकित्सा पध्दतियों की न केवल विश्वसनीयता बढ़े, बल्कि इनका आकर्षण दिल के साथ-साथ दिमाग को भी छुए। उन्होंने कहा कि मरीज एक आदमी होता है और उससे स्वस्थ बनाने के लिए जितनी भी चिकित्सा पध्दतियां है उन सभी की अच्छी बातों को उपयोग में लाना चाहिए।
राज्यपाल ने कहा कि आज प्राचीन चिकित्सा पध्दति के आधार पर यूरोप, अमेरिका, चीन, कोरिया और जापान जैसे देशों में शोध और अनुसंधान किए जा रहे हैं। भारत में हजारों सालों से प्राचीन चिकित्सा पध्दति के आधार पर चिकित्सा की जा रही है और इसकी समृध्द परम्परा रही है। विशेषकर खानदानी वैद्य एवं हकीमों की इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका रही है, इन पर लोगों की आस्था एवं विश्वास भी रहा है, लेकिन इसमें केवल एक कमी यह रही है कि इनके प्रमाणीकरण के लिए डाटाबेस तैयार नहीं किया गया है। राज्यपाल ने आगाह करते हुए यह भी कहा कि अगर विदेश में भारतीय चिकित्सा पध्दतियों के आधार पर किए गए अनुसंधानों से कोई दवा विकसित की जाएगी तो उसके लिए भारतीयों को ही अधिक राशि देकर इन्हें खरीदने पर बाध्य होना पड़ेगा। भारत में शोध एवं अनुसंधान करने पर जोर देते हुए उन्होंने यह भी बताया कि भारत शासन ने प्राचीन चिकित्सा पध्दतियों को बढ़ावा देने के लिए देश के विभिन्न स्थानों पर राष्ट्रीय स्तर के संस्थान खोले हैं। उन्होंने कहा कि चिकित्सा के लिए प्रिवेटिंग, प्रोटेक्टिव, क्यूरेटिव एण्ड रेक्यूप्रेटिव पध्दति अपनायी जाती है अर्थात् बीमारी की रोकथाम, बचाव, उपचार और बीमारी को दोबारा होने से रोकने के लिए प्रयास किए जाते हैं। मनुष्य को स्वस्थ बनाये रखने के लिए चिकित्सा के ये सभी हिस्से महत्वपूर्ण है और सभी पर जोर दिए जाने की आवश्यकता है।
राज्यपाल ने कहा कि हमारे देश और राज्य में वनौषधि पौधे पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। इन बहुमूल्य औषधीय पौधों के संग्रहण, भण्डारण की विधियों के साथ-साथ उसके उचित विक्रय, वितरण एवं प्रंसस्करण किए जाने की जरूरत है।
कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ आयुष एवं स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति पद्मश्री डॉ. ए.टी. दाबके ने कहा कि दो सौ वर्ष पूर्व तक विश्व में 99 प्रतिशत इलाज प्राचीन चिकित्सा पध्दति तथा औषधीय पौधों के जरिए किया जाता था। इन वर्षों में वैज्ञानिक अनुसंधानों से चिकित्सा पध्दति में अभूतपूर्व बदलाव आया है। देश में मौजूद पारंपरिक चिकित्सा पध्दति हमारी समृध्द धरोहर है। आधुनिक चिकित्सा पध्दति की तरह ही प्राचीन चिकित्सा पध्दतियों को भी प्रमाणिक आंकड़ों और वैज्ञानिक शोध के आधार पर इनकी विश्वसनीयता बढ़ाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कल्चर के माध्यम से शोध एवं अनुसंधान कार्य में लगने वाले समय को कम किया जा सकता है। उन्होंने बहुमूल्य औषधीय पौधों के संरक्षण तथा जर्मप्लाज्म के संरक्षण की दिशा में कार्य करने का सुझाव दिया। उन्होंने यह भी बताया कि केरल राज्य में प्राचीन पध्दति के आधार पर तरह तैयार की गयी औषधीय दवाईयों में उनके प्रमुख अवयवों, उपयोगिता तथा दुष्प्रभावों को स्पष्ट रूप से अंकित करने का कार्य किया जा रहा है।
कार्यशाला के विशिष्ट अतिथि तथा राष्ट्रीय वनौषधि बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री बाला प्रसाद ने कहा कि इस दो दिवसीय कार्यशाला के माध्यम से औषधीय संसाधनों के प्रबंधन और इसके संबंध में नीति-निर्माण्ा की दिशा में सुझाव मिल सकेगा तथा वन क्षेत्रों में औषधीय पौधों के उपयोग एवं संरक्षण पर जोर दिया जा सकेगा। उन्होंने बताया कि देश में अब तक विभिन्न चिकित्सा के क्षेत्रों में उपयोग मे आने वाली सात हजार 263 औषधीय पौधों की पहचान की गई है और इनमें से बहुत से पौधों का उपयोग भी किया जा रहा है, लेकिन हम केवल अपनी क्षमता और संभावनाओं का केवल 25 से 30 प्रतिशत का ही उपयोग कर पा रहे हैं। उन्होंने इस क्षेत्र में भारत को विश्व का नेतृत्व करने पर जोर दिया।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के प्रभारी सचिव श्री आर.एस. विश्वकर्मा ने कार्यशाला के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और कहा कि कार्यशाला में उपस्थित देश के प्रख्यात चिकित्सकों, विशेषज्ञों, व्यवसायियों, उद्योगपतियों तथा इससे जुड़े हुए लोगों के सुझावों का लाभ राज्य को मिल सकेगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा वनाच्छादित है। उन्होंने बताया कि आयुर्वेद, होम्योपैथी सहित अन्य प्राचीन चिकित्सा पध्दतियों को बढ़ावा देने के लिए राज्य में अनेक प्रयास किए जा रहे हैं।
कार्यक्रम के प्रारंभ में राज्यपाल श्री दत्त ने भगवान श्री धन्वन्तरि के चित्र के समक्ष दीप-प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर आयुष के संचालक डॉ. जी.एस. बदेशा, छत्तीसगढ़ राज्य वनोपज संघ के प्रबंध निदेशक श्री ए.के. सिंह भी उपस्थित थे। कार्यक्रम के अंत में डॉ. श्री विजय साहू ने आभार प्रदर्शन किया।

