पौने दो सौ वर्ष पुराना है रायपुर जेल का इतिहास
जेल परिसर में रचनात्मक माहौल : बंदियों के जीवन में बदलाव की बयार
रायपुर, 04 अप्रैल 2011

आपको यह जानकर निश्चित रूप से काफी रोमांच होगा कि राजधानी रायपुर स्थित केन्द्रीय जेल अण्डमान निकोबार द्वीप समूह के पोर्ट ब्लेयर में अंग्रेजों द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को काले पानी की सजा देने के लिए स्थापित कुख्यात सेल्यूलर जेल से भी अधिक पुरानी है। रायपुर की यह ऐतिहासिक जेल परिसर अब अपनी सृजनात्मक गतिविधियों की वजह से दूर-दराज तक काफी ख्याति प्राप्त कर रहा है। इन गतिविधियों की वजह से निर्मित रचनात्मक माहौल में यहां बंदियों के जीवन में बदलाव की राहत भरी बयार महसूस की जा रही है। रायपुर जेल के इतिहास के साथ मराठा युग, अंग्रेजी हुकूमत और स्वतंत्र भारतीय प्रशासन का इतिहास जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता संग्राम की अनेक सुनहरी यादें भी इस जेल की दीवारों और सलाखों से जुड़ी हुई हैं।
छत्तीसगढ़ के प्रसिध्द इतिहासकार डॉ. प्रभुलाल मिश्र और आचार्य रमेन्द्रनाथ मिश्र की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक 'छत्तीसगढ़ अभिलेख छवि' में बताया गया है कि तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर सी. इलियट द्वारा 06 फरवरी 1855 को नागपुर के कार्यवाहक कमिश्नर कैप्टन
के. इलियट को लिखे गए पत्र के अनुसार रायपुर के इस जेल में कैदियों और विचाराधीन बंदियों की संख्या 139 थी। दोनों इतिहासकारों का कहना है कि मराठा शासन काल के दौरान रायपुर में सन् 1825 में जेल की स्थापना हो चुकी थी, जबकि छत्तीसगढ़ में सन 1854 में मराठा राज्य के पतन के बाद अंग्रेज प्रशासन की शुरूआत हुई और तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत द्वारा वर्ष 1862 में नये स्वरूप में इस जेल की स्थापना की गयी। पोर्ट ब्लेयर के सेल्युलर जेल की स्थापना सन् 1896 में हुई। इस प्रकार रायपुर की इस केन्द्रीय जेल का इतिहास लगभग पौने दो सौ वर्ष पुराना है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अनेक गौरवपूर्ण यादें भी इस जेल से जुड़ी हुई हैं। महान क्रांतिकारी अमर शहीद वीर नारायण सिंह से लेकर पंडित सुन्दरलाल शर्मा, पंडित रविशंकर शुक्ल, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, नारायण राव मेघावाले और यतियतन लाल जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी इस जेल में अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाकर रखे गए थे।
राज्य के संभागीय मुख्यालय बिलासपुर स्थित जेल 138 वर्ष पुरानी है। इसका निर्माण सन 1873 में किया गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिन्दी के प्रसिध्द कवि स्वर्गीय पंडित माखन लाल चतुर्वेदी अपनी गिरफ्तारी के बाद पांच जुलाई सन 1921 से एक मार्च 1922 तक बिलासपुर जेल में रहे, जहां उन्होंने अपनी लोकप्रिय और कालजयी कविता 'पुष्प की अभिलाषा' की रचना की। वर्ष 1862 के आस-पास रायपुर जेल में एक हजार 636 कैदी थे। इनमें से 70 कैदी पढ़-लिख सकते थे। आज इस जेल में कैदियों की संख्या दो हजार 800 के आस-पास है। उन्हें स्कूल स्तर से लेकर कॉलेज स्तर तक स्वाध्याय और परीक्षा की सुविधा प्रदान की जा रही है। जेल में स्कूल स्तर की कक्षाएं संचा
लित की जा रही हैं। कई बंदी यहां कम्प्यूटर प्रशिक्षण, सिलाई प्रशिक्षण और बढ़ाईगिरी तथा हस्तशिल्प प्रशिक्षण भी प्राप्त कर रहे हैं। पुलिस वर्दियों की सिलाई भी यहां की जा रही है। जेल में एक प्रिन्टिग प्रेस भी कैदियों द्वारा संचालित है। यह उल्लेखनीय है कि कैदियों के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शुरू की गयी विभिन्न रोजगारमूलक गतिविधियों के कारण राजधानी रायपुर स्थित लगभग पौने दो सौ वर्ष पुरानी केन्द्रीय जेल इन दिनों दूर-दूर तक चर्चाओं के केन्द्र में है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के नेतृत्व में राज्य सरकार ने प्रदेश की जेलों में निवासरत कैदियों की सृजनात्मक प्रतिभा को निखारने के लिए विभिन्न प्रकार की उत्पादक गतिविधियों के संचालन की कार्य योजना तैयार की है, जिस पर केन्द्रीय जेल रायपुर में भी गंभीरता से अमल किया जा रहा है। इसके फलस्वरूप अपराध की अंधेरी दुनिया से यहां बंदी बनाकर लाए जाने वाले कैदी अब शिक्षा, साक्षरता और उत्पादन गतिविधियों से जुड़कर आत्म विश्वास और आत्म निर्भरता के जगमगाते माहौल में प्रवेश कर रहे हैं। राज्य शासन द्वारा इस जेल परिसर में वर्ष 2004 से आस्था पेट्रोल पम्प की स्थापना की गयी, जिसका संचालन कैदियों द्वारा किया जा रहा है।
इस जेल परिसर में मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप गौशाला की स्थापना भी की गयी है, जहां कैदी गौ-पालन के साथ-साथ दूध के साथ-साथ घी का उत्पादन प्राप्त कर र
हे हैं। कुछ वर्ष पहले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ही इस गौशाला का शुभारंभ किया था। लगभग दो हजार 800 कैदियों के रसोई घर में भोजन तैयार करने के लिए 600 किलोवाट थर्मल क्षमता के बायोमास गैसीफायर की स्थापना से यहां सालाना लगभग दस लाख रूपए मूल्य के ईंधन की बचत हो रही है। परिसर की गौशाला के गोबर का बेहतर उपयोग करते हुए यहां 35 घनमीटर क्षमता के बायोगैस संयंत्र का भी संचालन किया जा रहा है। इसके उपयोग से जेल प्रबंधन को सालाना करीब दो लाख 89 हजार रूपए मूल्य के एल.पी.जी. गैस सिलेण्डरों की बचत हो रही है। जेल में परम्परागत बिजली की बचत के लिए साढ़े चार सौ नग सी.एफ.एल. बल्ब का इस्तेमाल कर कम से कम दस प्रतिशत बिजली बचायी जा रही है।
जेल परिसर की गौशाला में गाय के दूध से बन रहा शुध्द देशी घी 400 रूपए प्रति किलो के हिसाब से बेचा जा रहा है। गौशाला में दूध, घी और गौमूत्र पर आधारित जीवन-दायिनी औषधीय गुणों से युक्त कई तरह की सामग्री भी तैयार की जा रही है। यहां बंदियो के हाथों निर्मित सुरभि चंदन धूप, लाल चंदन, नागरमोथा, कपूर काचरी और सुरभि अगरबत्ती की मनभावन महक आपराधिक वातावरण की दूषित हवा को खत्म कर रही है। गाय के ताजा गोबर, शुध्द गैरिक मुल्तानी मिट्टी, टिकिया तेल, नीम पत्ती, कपूर और पानी से तैयार किया जा रहा सुरभि साबुन चर्म रोग निवारण के लिए काफी गुणकारी है। यह साबुन प्रति नग दस रूपए में उपलब्ध है। जेल में संचालित कुटीर उद्योगों में सोफा सेट, पलंग, डायनिंग टेबल, दरी और सजावटी सामानों सहित हस्तशिल्प की अनेक कलाकृतियां भी कैदियों द्वारा तैयारी की जा रही है। उल्लेखनीय है कि कैदियों के हाथों तैयार इन सभी वस्तुओं की बिक्री के लिए जेल परिसर में करीब 44 लाख रूपए की लागत से एम्पोरियम भवन का निर्माण किया गया है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पिछले पखवाड़े (22 मार्च को) इस एम्पोरियम का लोकार्पण किया था।
पुराने सरकारी अभिलेखों में दर्ज इतिहास के अनुसार रायपुर केन्द्रीय जेल के साथ भी अनेक दिलचस्प प्रसंग जुड़े हुए हैं। सन् 1862 में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा कारागार संगठन की स्थापना का निर्णय लिया गया था। इसके अन्तर्गत छोटे जिलों में सिविल सर्जन को जेल के लिए प्रशासनिक अधिकारी बनाया गया था। डॉक्टर बेंसले रायपुर जेल के प्रथम अधीक्षक नियुक्त हुए
थे। रायपुर केन्द्रीय जेल की स्थापना नागपुर, जबलपुर और होशंगाबाद की जेलों के साथ हुई थी। दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1862 में रायपुर जेल और 1873 में बिलासपुर जेल का भवन निर्माण शुरू हुआ। रायपुर जेल भवन का निर्माण छह साल बाद 1868 पूर्ण हुआ। उस समय इस जेल का क्षेत्रफल 78.42 एकड़ था। इसमें 18 एकड़ में भवन 26 एकड़ में बगीचा और 19 एकड़ में तालाब भी था। रायपुर जेल की एक विशेषता यह भी थी कि यहां कुष्ठ रोगियों का विशेष इलाज किया जाता था। उन दिनों इस जेल में कैदियों की मृत्यु दर 03.79 और बीमार कैदियों का दैनिक औसत 4.53 प्रतिशत था। जेल में विभिन्न प्रकार की सामग्री बनाने का चलन उन दिनों भी था। पुराने दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1862 में इस जेल में सामग्रियों से 905 रूपए की आमदनी हुई थी।
वर्ष 1922 तक रायपुर जेल में तत्कालीन मध्य प्रान्त की सरकार के लिए पुलिस की वर्दियां और बरार प्रान्त के लिए 'जंगलिया वर्दी' का निर्माण होता था। ब्रिटिश सरकार ने एक दिसम्बर 1870 को बंदी अधिनियम लागू किया। इसके अन्तर्गत अनुकरणीय आचरण करने वाले कैदियों को मित्रों से भेंट करने, बेड़ियों से मुक्ति, सदाचरण बैज, सजा में छूट, कारागार और कार्यालय में कार्य के साथ पदोन्नति आदि की रियायते शुरू की गयी। वर्ष 1864 में महिला बंदियों और वर्ष 1939 में राजनीतिक बंदियों को अलग-अलग रखने की व्यवस्था की गयी। अभिलेखों के अनुसार वर्ष 1876 में जेल महानिरीक्षक की नियुक्ति को पुलिस महानिरीक्षक की नियुक्ति में सम्बध्द कर दिया गया। वर्ष 1903 में जेल महानिरीक्षक के पद को पुलिस महानिरीक्षक के पद से अलग कर दिया गया। वर्ष 1876 में पहली बार जेल में भोजन की घटी मात्रा देने की शुरूआत हुई। पुन: एक अप्रैल 1883 को सभी कैदियों के लिए भोजन की एक पुनरीक्षित मात्रा लागू की गयी। वर्ष 1889 में जेलों में पुलिस गार्ड के स्थान पर वार्डर गार्ड तैनात करने की योजना बनी। वर्ष 1909 में जगदलपुर (बस्तर) जेल को प्रथम श्रेणी जेल का दर्जा दिया गया। वर्ष 1912 में विमुक्त कैदियों के पुनर्वास के लिए बंदी सहायता संस्था की शुरूआत हुई। वर्ष 1939 में कैदियों को पैरोल पर निर्धारित समय के लिए छोड़ने की शुरूआत हुई। छत्तीसगढ़ के वर्तमान संभागीय मुख्यालय अम्बिकापुर (सरगुजा) की उप-जेल को वर्ष 1969 में जिला जेल का दर्जा दिया गया।

