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छत्तीसगढ़ की जेलों का बदलता परिदृश्य

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When Nov 02, 2011
from 09:20 PM to 09:20 PM
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  • आलेख : संत कुमार चंद्राकर
    छत्तीसगढ़ की जेलों का परिदृश्य अब काफी बदल चुका है। यहां की जेलों में तेरह हजार से अधिक परिरूध्द बंदियों को सुरक्षित अभिरक्षा में रखकर उनके लिए समुचित आवास, भोजन, चिकित्सा, वस्त्र, शिक्षण, प्रशिक्षण, मनोरंजन, खेलकूद और मानसिक उत्थान के साथ स्वावलंबी बनाने की दिशा में सराहनीय कार्य किए जा रहे हैं। बंदियों को व्यवसायिक प्रशिक्षण देकर प्रशिक्षित किया जा रहा हैए ताकि वे जेल से रिहाई के उपरांत अपने जीविकोपार्जन के लिए स्वावलंबी बन सके। बंदियों के सर्वांगीण विकास के लिए जेलों में धार्मिक, आध्यात्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक वातावरण उपलब्ध कराया जा रहा है।
    छत्तीसगढ़ में पांच केन्द्रीय जेल. रायपुर, बिलासपुर, जगदलपुर, अम्बिकापुर, दुर्ग एवं दस जिला जेल. रायगढ़, जशपुर, बैकुण्ठपुर, कोरबा, राजनांदगांव, दंतेवाड़ा, महासमुंद, जांजगीर, धमतरी, कांकेर और बारह उपजेल. डोंगरगढ़, बेमेतरा, बालोद, गरियाबंद, बलौदाबाजार, सुकमा, नारायणपुर, पेण्ड्रारोड, सूरजपुर, रामानुजगंज, कटघोरा और मनेन्द्रगढ़ में है। उप जेल सुकमा और उप जेल नारायणपुर वर्तमान में सुरक्षागत कारणों से बंद हैं। जेलों में निरूध्द पुरुष और महिला बंदियों को लगातार शिक्षित किया जा रहा है और उनकी शारीरिक और बौध्दिक क्षमताओं का भरपूर उपयोग कर उनका उत्पादन उपयोग भी सुनिश्चित किया जा रहा है। प्रदेश की केन्द्रीय जेलों में बंदियों को विभिन्न प्रकार के उद्योग से संबंधित प्रशिक्षण दिया जाता है। जिनमें प्रमुख है. बुनाई, सिलाई, बढ़ई, लोहारी, वुड कार्विंग, साबुन एवं वाशिंग पाउडर, ऑॅफसेट प्रिंटिंग एवं स्क्रीन प्रिंटिंग, पावरलूम, कम्बल निर्माण, बेलमेटल, फिनाईल, लकड़ी के तखत, ऑॅफिस चेयर, कैन चेयर, कुशन वाला सादा चेयर, छात्र चेयर, ब्लेक बोर्ड, आलमारी, कैश काऊंटर, सोफासेट, टाटपट्टी, विभिन्न साईजों की दरी, गलीचा, जी.आई. पेटी,  बाल्टी, काष्ठ कला, लकड़ी नक्काशी, विभिन्न साईज की ऑॅफिस टेबल, छात्र टेबल, बेन्च, कॉन्फ्रेन्स टेबल, रैक, लग्जरी सोफासेट, लोहे की कुर्सिया, चॉक, विभिन्न प्रकार के गणवेश सिलाई, मशाले, हल्दी, मिर्च, धनिया, वाशिंग पाउडर, निवाड़, कूलर, जूट के सजावटी सामान, टेराकोटा मूर्ति उद्योग आदि। केन्द्रीय जेल रायपुर स्थित महिला प्रकोष्ठ में महिला बंदियों द्वारा कढ़ाई, बुनाई, सिलाई तथा काथा कढ़ाई, पापड़, अचार बनाने आदि का कार्य किये जाते हैं। अशासकीय महिला समाज सेवी संगठनों द्वारा जेल में परिरूध्द महिला बंदियों को काथा कढ़ाई का प्रशिक्षण दिया गया है। इस कला में महिला बंदी धागे से कोसा कपड़े में विभिन्न प्रकार की चित्रकारी करती हैं।
    जेल उत्पाद की अनेक सामग्री आम व्यक्ति के उपयोग के लिए बिक्री हेतु केन्द्रीय जेल परिसर रायपुर स्थित एम्पोरियम में प्रदर्शित की जाती हैं। केन्द्रीय जेल जगदलपुर अब सुधार गृह के साथ एक ऐसे कुटीर उद्योग और हस्तशिल्प केन्द्र के रुप में विकसित हो रहा है जहां बंदी अपने पैरों पर खड़े होने का हुनर सीख रहे हैं। इस जेल के सैकड़ों बंदी विभिन्न कुटीर उद्योग धंधों में प्रशिक्षित होकर प्रति वर्ष लाखों रुपए की आमदनी अर्जित कर रहे हैं। जेलों में विभिन्न उद्योगों को संचालित करने का मुख्य उद्देश्य बंदियों को व्यस्त रखना और उन्हें सजा समाप्ति पश्चात आजीविका उपार्जन में सुविधा दिलाना है ताकि जेल से रिहाई के बाद अपने पुनर्वास हेतु स्वावलंबी रहकर अपना व अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें।
    बंदियों के मानसिक.बौध्दिक विकास, ज्ञान वृध्दि तथा मनोरंजन के लिए जेलों में पुस्तकालय की व्यवस्था की गई है। इसमें विभिन्न विषयों की पुस्तकों का संग्रह है। इनमें विशेष रूप से महापुरुषों की जीवनी, सामान्य ज्ञान, बागवानी, कृषि, पशुपालन तथा अन्य समसामयिक घटनाओं का साहित्य उपलब्ध कराया गया है। जेलों को श्रेणी के अनुसार निश्चित वार्षिक धनराशि पुस्तकें क्रय करने के लिए उपलब्ध कराने का प्रावधान है। नियमानुसार बंदियों को विभिन्न समसामयिक पत्र-पत्रिकाएं एवं स्थानीय दैनिक समाचार पत्र भी पढ़ने के लिए उपलब्ध करायी जाती है। केन्द्रीय जेल रायपुर और जगदलपुर के परिरूध्द महिला बंदियों के बच्चों को पब्लिक स्कूलों में दाखिला दिलाया गया है। उक्त बच्चे प्रतिदिन महिला प्रहरियों के साथ पब्लिक स्कूल भेजे जाते हैं। इसी प्रकार केन्द्रीय जेल बिलासपुर और अम्बिकापुर में परिरूध्द महिला बंदियों के बच्चों को जेल परिसरों में स्थित झूला घरों में भेजा जाता है। समय-समय पर जेलों में शासकीय अस्पताल तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा स्वास्थ्य शिविर आयोजित किये जाते हैं। शिविर में समस्त बंदियों का स्वास्थ्य परीक्षण कर अस्वस्थ बंदियों को तत्काल उपचार प्रदान किया जाता है।
    प्रदेश की जेलों में विभिन्न अवसरों पर मनोरंजन के साथ-साथ संपूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए नृत्य, गायन, ड्रामा, वाद-विवाद प्रतियोगिता, प्रहसन, नाटक, परिचर्चा आदि का आयोजन किया जाता है। भजन-कीर्तन, रामायण, भागवत गीता का वाचन, बाईबिल, कुरान का पाठ तथा धार्मिक अवसरों पर कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। जेल में बंदियों की भजन मंडलियों को हारमोनियम, ढोलक, मंजिरा एवं भजन पुस्तिका उपलब्ध कराया गया है। छत्तीसगढ़ सरकार की बंदियों के कल्याण और पुनर्वास नीति में यह महत्वपूर्ण है कि इससे बंदियों में मनोवैज्ञानिक रूप से मानसिक, आध्यात्मिक और स्वास्थ्य में भी सुधार होता है तथा उन्हें किये गए अपराध से हुई आत्मग्लानि और अवसाद से मुक्ति पाने का मार्ग भी प्रशस्त होता है। इससे बंदियों के समय और ऊर्जा का उपयोग उत्पादन में होता है जो उनके समय में सदुपयोग के साथ आगे चलकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ने और स्वावलंबी बनने में उपयोगी साबित हो रहा है।

  • आलेख : संत कुमार चंद्राकर

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