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राष्ट्रीय विकास परिषद की 56 वीं बैठक :नई दिल्ली 22 अक्टूबर 2011

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When Oct 22, 2011
from 03:40 PM to 03:40 PM
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(मुख्यमंत्री जी की ओर से राजस्व मंत्री श्री अमर अग्रवाल द्वारा प्रस्तुत)

    माननीय प्रधानमंत्री जी, माननीय उपाध्यक्ष, योजना आयोग, माननीय केन्द्रीय मंत्रीगण, राज्यों के माननीय मुख्यमंत्री एवं मंत्रीगण, परिषद के अन्य गणमान्य सदस्यगण एवं मित्रों   राष्ट्रीय विकास परिषद की 56वीं बैठक में उपस्थित सभी महानुभावों को मैं छत्तीसगढ़ राज्य की जनता की ओर से दीपावली की शुभकामनाएं देता हूं। 12वीं पंचवर्षीय योजना के ''एप्रोच पेपर'' पर आज के उपयोगी परिसंवाद से देश में ''सभी के लिए विकास'' का राष्ट्रीय उद्देश्य प्राप्त करने का मार्ग प्रशस्त होगा। इस दृष्टि से यह बैठक अति महत्वपूर्ण है।
2.    अध्यक्ष महोदय, 12वीं पंचवर्षीय योजना के लिये ''एप्रोच पेपर'' तैयार करने हेतु पटना में आयोजित क्षेत्रीय स्तर के विचार-विमर्श में हमने छत्तीसगढ़ राज्य के सुझाव प्रस्तुत किये थे। मुझें खुशी है कि आज परिषद द्वारा जिस ''एप्रोच पेपर'' पर विचार किया जा रहा है, उसमें  हमारे कई सुझावों को शामिल किया गया है।
3.    महोदय, छत्तीसगढ़ राज्य को बुनियादी आर्थिक ढांचें एवं सामाजिक सूचकांकों में पिछड़ापन विरासत में मिला है। फिर भी विगत 10 वर्षों में राज्य ने अच्छी प्रगति की है।
  •   10वीं पंचवर्षीय योजना की कालावधि में आर्थिक विकास की 9.3 प्रतिशत दर हासिल की।
  •   11वीं पंचवर्षीय योजना में राज्य के लिए लक्षित आर्थिक विकास दर 8.60 प्रतिशत के विरूध्द प्रथम चार वर्षों में 9.71 प्रतिशत विकास दर हासिल होने का अनुमान है।
  •    हमने 11वीं योजना के दौरान राज्य की योजना के आकार में औसतन 25.45 प्रतिशत की वार्षिक दर से वृध्दि की है।
  •    यद्यपि राज्य को प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य अधोसंरचना, ग्रामीण आमदनी बढ़ाने एवं खाद्य सुरक्षा प्रदान करने में अच्छी सफलता मिली है, तथापि समावेशी विकास की प्रगति अनुमान से कुछ कम रही है। इसके मुख्य कारण मुद्रा स्फीति, राज्य की भौगोलिक विशेषताएं एवं वामपंथ उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यक्रमों को लागू करने में आने वाली कठिनाईयाँ रहीं।
4.    अध्यक्ष महोदय, राज्य का एतिहासिक पिछड़ापन तीव्र एवं समावेशी विकास प्राप्ति को प्रभावित कर रहा है। विगत 10 वर्षों में पूरे मनोबल के साथ आर्थिक एवं सामाजिक विकास के प्रयासों के बावजूद छत्तीसगढ़ विकास एवं सामाजिक सूचकांकों के उन्नयन में राष्ट्र्ीय स्तर से काफी पीछे है। इस संबंध में मैं कतिपय सूचकांकों का उल्लेख करना चाहूंगा :

    बुनियादी आर्थिक ढांचे की स्थिति :

  •      राज्य में सड़कों की लम्बाई 24.7 किलोमीटर प्रति 100 वर्ग किलोमीटर है, जो 74.9 किलोमीटर के राष्ट्रीय औसत का मात्र एक तिहाई है।
  •     राज्य में रेल मार्गों की लम्बाई 0.77 किलोमीटर प्रति 100 वर्ग किलोमीटर है, जो 1.9 किलोमीटर के राष्ट्रीय औसत का मात्र 40 प्रतिशत है।
  •     राज्य में सिंचाई क्षमता 31 प्रतिशत है, जो 49 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत का केवल दो तिहाई है।
  •        राज्य में कृषि योग्य क्षेत्र 34 प्रतिशत है, जो 42.8 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से कम है।
  •      राज्य में बीपीएल जनसंख्या 40.9 प्रतिशत है, जो 27.5  प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।

    सामाजिक सूचकांकों की स्थिति:.

  •  मातृत्व मृत्यु दर 254 के राष्ट्र्ीय औसत की तुलना में 335 प्रति लाख है।
  • शिशु मृत्यु दर 50 के राष्ट्र्ीय औसत की तुलना में 54 प्रति एक हजार है।
  •  साक्षरता दर 74 प्रतिशत के राष्ट्र्ीय औसत की तुलना में 71 प्रतिशत है।
  •  कुपोषण की दर 45.9 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत की तुलना में 52.1 प्रतिशत है।
  •   महिलाओं में रक्ताल्पता 55.3 प्रतिशत के राष्ट्र्ीय औसत की तुलना में 57.5 प्रतिशत है।
5.    अध्यक्ष महोदय, हमें यह बात समझनी होगी कि हमारे विशाल देश के विभिन्न क्षेत्रों तथा राज्यों में विकास की संभावनाएं और जरूरतें एक जैसी नहीं है। मैं छत्तीसगढ़ राज्य की कुछ उन विशेषताओं से सदन को अवगत कराना चाहूंगा, जो छत्तीसगढ़ को देश के विकसित राज्यों से अलग बनाती हैं:
  •   छत्तीसगढ़ का 60 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र अनुसूचित क्षेत्र है।
  •   23 प्रतिशत के राष्ट्रीय औसत के विरूध्द छत्तीसगढ़ राज्य की 44 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की है।
  •   राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 20 प्रतिशत वास्तविक वन क्षेत्र के विरुध्द छत्तीसगढ़ का 56 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र आरक्षित, संरक्षित तथा राजस्व वन क्षेत्र है।
  •    राष्ट्रीय स्तर पर उग्रवाद से प्रभावित कुल 60 जिलों में से 10 जिले छत्तीसगढ़ राज्य के हैं।
        महोदय, देश के विभिन्न क्षेत्रों की विकास संभावनाओं एवं आवश्यकताओं में भारी अंतर होने के बावजूद वर्तमान में सम्पूर्ण देश के लिए एक समान केन्द्रीय व केन्द्र प्रवर्तित योजनाएं बनाने और क्रियान्वित करने की व्यवस्था का अनुसरण किया जा रहा है। हम महसूस करते हैं कि इस व्यवस्था में परिवर्तन करते हुए देश के विभिन्न क्षेत्रों तथा राज्यों की संभावनाओं और आवश्यकताओं पर आधारित विशेष योजनाएं बनायी जानी चाहिए। इसके लिए राज्यों को अधिक स्वायत्तता देते हुए नियोजन की छूट दी जानी चाहिए।
6.    महोदय, अब मैं 12वीं पंचवर्षीय योजना के ''एप्रोच पेपर'' पर सैक्टर वाइज राज्य के कुछ सुझाव सदन के सम्मुख रखना चाहँगा:

(i)   ऊर्जा

    छत्तीसगढ़ में थर्मल पावर जेनरेशन की अपार संभावनाएं है। वर्तमान में 30 हजार मेगावाट से अधिक क्षमता की विद्युत उत्पादन परियोजनाओं पर काम चल रहा है और छत्तीसगढ़ 12वीं योजना काल में विद्युत उत्पादन के राष्ट्रीय लक्ष्य में महती भागीदारी निभाहने की स्थिति में है।
        महोदय, यह देश तथा राज्यों सभी के हित में होगा कि पिटहैड थर्मल पावर जेनरेशन को बढ़ावा दिया जाए। किन्तु थर्मल पावर प्लांट्स के लिए थर्मल पावर उत्पादक राज्यों को जहां एक ओर अपनी जमीन और पानी जैसे संसाधन उपलब्ध कराने होते है, वहीं दूसरी ओर विपरीत पर्यावरणीय असर को भी वहन करना होता है। अतएव, हमारी काफी पुरानी इस मांग को स्वीकृति दी जाए कि थर्मल बिजली निर्यातक राज्यों को उत्पादित बिजली का 10 प्रतिशत हिस्सा मुफ्त मिले या फिर विद्युत उत्पादन पर कम से कम 4 प्रतिशत की दर से विद्युत शुल्क लगाने का कानूनी प्रावधान किये जाएं।
        इसके अतिरिक्त, यह भी सुझाव है कि :
  •  राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को चालू रखते हुए इसके क्रियान्वयन की गति बढ़ाई जाए।
  •   ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि के लिए बिजली सप्लाई की गुणात्मकता सुनिश्चित करने के लिये अलग फीडर बनाने की केन्द्रीय योजना लागू की जाए।

(ii)   रेल तथा सड़क अधोसंरचना :

    महोदय, छत्तीसगढ़ सड़क और रेल अधोसंरचना में राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं। छत्तीसगढ़ की कोयले, आयरन ओर, स्टील तथा सीमेन्ट उत्पादन में बहुत बड़ी भागीदारी है। भारतीय रेल्वे के राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा छत्तीसगढ़ राज्य से मिलता है। नये रेल एवं राष्ट्रीय राजमार्गों के लिये वर्तमान पीपीपी मॉडल छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्य के लिये वायबल नहीं हैं। अतएव 12वीं योजना में :
  •    छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्यों के लिए रेल तथा राष्ट्रीय राजमार्गों के पीपीपी माडल में बदलाव किया जाए।
  •   प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को चालू रखते हुए इसमें जहां जरूरी हो, डबल कनेक्टीविटी की अनुमति तथा निर्मित सड़कों के संधारण हेतु अतिरिक्त सहायता दी जाए।

(iii)  प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन

    राज्य में बढ़ती जनसंख्या के दबाव एवं औद्योगीकरण के कारण जल, जंगल एवं खनिजों का दोहन बढ़ रहा है। देश में वास्तविक वन क्षेत्र 19.3 प्रतिशत है और वानिकी का राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत रखा गया है। हमारा 56 प्रतिशत क्षेत्र आरक्षित, संरक्षित तथा राजस्व वनों का है। इन्हें हम स्वयं के वित्तीय संसाधनों से संरक्षित कर रहे हैं, जबकि इसका पर्यावरणीय लाभ पूरे राष्ट्र को होता है। इसलिये हमारा सुझाव है कि 12वीं योजना में :
  •   राष्ट्रीय लक्ष्य से अधिक वन संरक्षित एवं सुरक्षित रखने वाले राज्यों को केन्द्र द्वारा मुआवजा दिया जाना चाहिए।
  •   केन्द्र प्रवर्तित योजना 'एकीकृत जलग्रहण प्रबंधन कार्यक्रम' को जारी रखा जाए ताकि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण एवं संर्वधन के कार्य किये जा सकें।

(iv)  ग्रामीण विकास

    छत्तीसगढ़ की ग्रामीण जनसंख्या 75 प्रतिशत से अधिक है। ''एप्रोच पेपर'' में ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अधिक अवसर निर्माण करने की बात कही गई है। इस संबंध में हमारे कुछ सुझाव इस प्रकार हैं :
  •   वाटरशेड डेव्हलपमेंट, के कार्यक्रम का ग्रामीण विकास की अन्य योजनाओं से ताल मेल के साथ कुशल एवं प्रशिक्षित तकनीकी अमले के माध्यम से क्रियान्वयन करने के अच्छे परिणाम मिलेंगे।
  •   अधिक समावेशी ग्रामीण विकास की प्राप्ति के लिए कृषि उत्पादों तथा लघु वनोपजों के लोकन वैल्यू एडिशन पर फोकस किया जाना चाहिए।
  •       वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न प्रशासकीय मंत्रालयों द्वारा पृथक-पृथक योजनाएं संचालित है, जिनके कनवर्जेन्स की आवश्यकता है।
  •        ग्रामीण स्किल डेव्हलपमेंट मिशन तथा ग्रामीण स्वरोजगार योजनाओं को एक ही प्रशासकीय मंत्रालय/विभाग के तहत लाने की आवश्यकता है।

(v)   आदिवासी विकास :

    राज्य का 60 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र पांचवी अनुसूचित क्षेत्र है और 32 प्रतिशत के लगभग आबादी अनुसूचित जनजातियों की है। छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों के आदिवासी बाहूल्य क्षेत्र नक्सल प्रभावित है। आदिवासी क्षेत्रों के तेज विकास तथा वामपंथ उग्रवाद पर नियंत्रण के संबंध में हमारे कुछ सुझाव इस प्रकार है :
  •  नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए लागू की गई ''इंटीग्रेटेड एक्शन प्लान'' को जिले के बजाए विकासखण्ड को इकाई मानते हुए देश के सभी अनुसूचित क्षेत्रों में लागू किया जाए।
  •         कृषि फसलों की भांति सभी लघु वनोपजों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की केन्द्रीय योजना शीघ्र लागू की जाए।
  •        अनुसूचित क्षेत्रों में अच्छी स्कूली शिक्षा रेसिडेन्शियल स्कूलों के माध्यम से ही हो सकती है। अतएव इन क्षेत्रों में एस.एस.ए. के तहत रेसिडेन्शियल स्कूलों की स्थापना की नीतिगत छूट दी जाए। साथ ही अनुसूचित क्षेत्रों में शिष्यवृत्ति 10 मास के बजाए 12 मास दी जाए।
  •       वामपंथ उग्रवाद पर नियंत्रण के लिए कनेक्टीविटी एक अनिवार्यता है। वर्तमान में निर्माण एजेंसियों की अनुपलब्धता के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है। इस समस्या का समाधान केन्द्रीय सरकार के स्तर पर निकाला जाए।

(vi)  कृषि एवं सिंचाई :

    महोदय, समावेशी विकास तथा खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि उत्पादकता और उत्पादन बढ़ाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। 11वीं पंचवर्षीय योजना काल में छत्तीसगढ़ के लिए फार्म सेक्टर के लिए 1.7 प्रतिशत विकास दर के लक्ष्य के विरूध्द 2.6 प्रतिशत से अधिक विकास दर प्राप्त होना अनुमानित है। छत्तीसगढ़ खाद्यान्न उत्पादन में एक सरप्लस राज्य है और कृषि उत्पादन बढ़ाने की महती संभावनाएं है। फार्म सैक्टर के संबंध में कुछेक सुझावों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा :
  •    ''कृषि अनुसंधान'' और हमारे क्षेत्र में विशेष रूप से ''आदिवासी कृषि अनुसंधान'' पर अधिक फोकस देने की आवश्यकता है।
  •    आर.के.व्ही.वाय. से क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप सैक्टर के विकास में मद्द मिली है। इसके आकार को बढ़ाया जाना चाहिए।
  •     नेशनल हार्टिकल्चर मिशन को छत्तीसगढ़ राज्य के सभी जिलों में लागू किया जाए।
  •     जैविक खाद के उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, जो दिया जाना चाहिए।
  •    उपलब्ध जल भंडारों एवं नहर प्रणालियों के वैज्ञानिक प्रबंधन से अधिकाधिक कृषि योग्य क्षेत्र में सिचांई की जा सकती है। इसके लिए कच्ची नहरों की लाईनिंग, स्प्रिंकलर एवं ड्रिप इरिगेशन सहित माइक्रो माईनर इरिगेशन पर और अधिक फोकस किया जाना चाहिए।
  •   कृषि शिक्षा का विस्तार किया जाना चाहिए। प्रत्येक जिले में कम से कम एक कृषि महाविद्यालय खोलने का लक्ष्य रखा जाए और स्कूली पाठयक्रम में कृषि विषय को अनिवार्य करने पर विचार किया जाए।
  •   ए.आई.बी.पी. के मानदण्डों को लचीला तथा व्यवहारिक बनाते हुए इसे जारी रखा जाए। इसमें जर्जर पुरानी सिंचाई योजनाओं का पुर्निर्माण, नदीं, नालों पर एनीकट बनाकर लिफ्ट इरिगेशन, कच्ची नहरों की लाइनिंग, आदि जैसे कार्यों को भी शामिल किया जाए।
  •   जिन आदिवासी परिवारों को वन भूमि पर अधिकार दिये गये हैं, उन्हें भूमि विकास के लिए बैंक ऋण दिये जाने चाहिए।
  •    एक समयबध्द कार्यक्रम बनाकर पर्याप्त खाद्यान्न भडारण क्षमता बनायी जाए।

(vii)   उद्योग एवं खनिज

    महोदय, राज्य का एक बड़ा क्षेत्र कोयला, आयरन ओर, लाइम स्टोन, बाक्साइट, आदि खनिजधारी क्षेत्र है। हमारे खनिज बाहुल्य क्षेत्र कृषि एवं कृषि पर आधारित आर्थिक गतिविधियों से वंचित हैं। वर्तमान में खनन राजस्व का प्रमुख हिस्सा केन्द्रीय राजकोष को चला जाता है। उदाहरण के लिए वर्ष 2010-11 में एनएमडीसी के 9,727 करोड़ रूपये के लाभ में से राज्य सरकार को मात्र 932 करोड़ रूपये की रायल्टी प्राप्त हुई, जबकि कार्पोरेट टैक्स तथा डिविडेन्ड के रूप में केन्द्र सरकार को 5000 करोड़ रूपये से अधिक की राशि प्राप्त हुई। यह व्यवस्था कृषि और कृषि पर आधारित आर्थिक कार्यकलापों से वंचित खनिजधारी क्षेत्रों, खनिज स्वामी राज्यों के प्रति न्यायपूर्ण नही है।
        अधिक समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्ति के लिये उद्योग एवं खनन क्षेत्र के संबंध में हमारे सुझाव इस प्रकार हैं :
  •    खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की स्थापना पर और अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
  •   विद्यमान ''लघु उद्योग समूहों'' को प्रतिस्पर्धा के लिये सक्षम बनाने के लिए इनके विकास की आवश्यकता है।
  •   माइक्रो-इन्डस्ट्री रोजगार के सर्वाधिक अवसर उपलब्ध कराती है। इसके विकास के लिए क्लस्टर आधारित एप्रोच अपनायी जानी चाहिए।
  •   देश में ही वैल्यू एडिशन कर रोजगार के अधिक अवसर निर्मित करने के लिये लौह अयस्क जैसे कच्चे माल के निर्यात पर प्रतिबन्ध लगाया जाए।
  •  खान एवं खनिज कानून के प्रावधान बदले जाएं ताकि खनन से प्राप्त होने वाले राजस्व का बड़ा हिस्सा केन्द्र सरकार के बजाए खनिज स्वामी राज्यों और खनिजधारी क्षेत्रों को प्राप्त हो।

(viii) स्वास्थ्य

    महोदय, राज्य में स्वास्थ्य के बुनियादी ढ़ांचे का पर्याप्त विस्तार हुआ है। किन्तु स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता है। इस हेतु प्रशिक्षित मानव संसाधन सुलभ कराने आवश्यक हैं। 12वीं योजना के लिए हमारे सुझाव इस प्रकार हैं :
  •   मेडिकल कालेजों में सीटों की त्वरित वृध्दि के साथ साथ तीन साल का मेडिकल कोर्स यथा शीघ्र लागू किया जाए।
  •   एन.आर.एच.एम. को शहरी क्षेत्रों में भी लागू किया जाए।
  •   स्वास्थ्य बीमा योजना सभी वंचित समूहों के लिए लागू की जाए।
  •   चूंकि वामपंथ उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में व्यवहारिक कठिनाई है, इन क्षेत्रों में केन्द्रीय योजना के तहत मोबाइल चिकित्सा सेवा को बढ़ावा दिया जाए।
  •   आदिवासी क्षेत्रों की पारम्परिक चिकित्सा पध्दतियों को बढ़ावा देने के लिए उनके संरक्षण एवं अनुसंधान के लिए उपयुक्त योजना बनाई जाए।

(ix)   शिक्षा एवं कौशल विकास

    महोदय, शिक्षा के अधिकार कानून को लागू करने के लिए शिक्षा क्षेत्र के योजना व्यय में दो गुनी वृध्दि हुई है तथा राज्य योजना खर्च की एक चौथाई से अधिक धनराशि शिक्षा के लिए दी जा रही है। 'राज्य कौशल विकास मिशन' प्रारम्भ किया गया है और वर्ष 2022 तक 1.25 करोड़ लोगों के कौशल निर्माण का संकल्प लिया गया है।
        समावेशी विकास के लिए हमें शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल उन्नयन पर विशेष ध्यान देना होगा। शिक्षा के सभी स्तरों पर गुणवत्ता में सुधार की बात ''एप्रोच पेपर'' में कही गई है। इससे हम पूर्णत: सहमत है। शिक्षा एवं कौशल विकास के क्षेत्र के लिए हमारे कुछ सुझाव इस प्रकार है :
  •   सर्व शिक्षा अभियान के वित्त पोषण को संशोधित कर 75:25 किया जाए।
  •   रोजगार तथा स्वरोजगार की आवश्यकता के अनुसार स्कूली पाठयक्रमों को कौशल उन्नयन करने वाला तथा रोजगार परक बनाया जाए।
  •   उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुपालन में सभी स्कूलों में पेयजल, बिजली, शौचालय तथा बाऊंड्रीवाल निर्माण करने के लिए उपयुक्त केन्द्रीय योजना लागू की जाए।

(x)   शहरी प्रबन्धन 

    महोदय, छत्तीसगढ़ में कुल 168 नगरीय निकाय हैं, जहां सड़क, पानी, सीवरेज, स्ट्रीट लाइटिंग, सस्ते आवास, आदि बुनियादी नागरिक सुविधाएं एवं सेवाएं सुलभ कराना आवश्यक है।
        छत्तीसगढ़ राज्य को विभिन्न केन्द्रीय योजनाओं के अंतर्गत प्राप्त होने वाले वित्त पोषण का विश्लेषण दर्शाता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्राप्त होने वाली प्रति व्यक्ति 4030 रूपये की धनराशि की तुलना में जे.एन.एन.यू.आर.एम. शहर रायपुर के लिए 1250 रूपये प्रति व्यक्ति तथा नान-जे.एन.एन.यू.आर.एम. नगरीय क्षेत्रों के लिए केवल 498 रूपये प्रति व्यक्ति धनराशि प्राप्त हुई। अतएव, 12वीं पंचवर्षीय योजना में छोटे एवं मझौले शहरों की मूलभूत नागरिक सेवाओं एवं बुनियादी ढ़ांचे के निर्माण हेतु अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराये जाने चाहिए।  

(xi)    योजना के लिए संसाधन

    11वीं पंचवर्षीय योजना काल में वामपंथ उग्रवाद से लड़ने के लिए सुरक्षा खर्च, महंगाई की ऊँची दर तथा वेतन बढ़ोत्तरी के कारण राज्य में गैर योजना मद खर्च बढ़ा है। जैसा कि मैने कुछ समय पूर्व कहा था, शिक्षा के सेक्टर में कुल योजना मद का खर्च 14 प्रतिशत से बड़कर 26 प्रतिशत हो गया है। इसका परिणाम यह होगा कि भविष्य में राज्य को योजना मद के लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों में महती कमी आएगी। अतएव छत्तीसगढ़ जैसे पिछड़े राज्यों द्वारा योजना खर्च के लिए आवश्यक वित्तीय संसाधन जुटाये जाने के लिए कतिपय नीतिगत निर्णय लिये जाने आवश्यक हैं। जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं :
  •   जैसा कि मैंने अभी-अभी कहा था, खनिजों के दोहन से प्राप्त होने वाले राजस्व का बहुत बड़ा हिस्सा केन्द्र सरकार को चला जाता है। इसलिए बाजार मूल्य पर बेचे जाने वाले खनिजों की रायल्टी दरें बढ़ाने का पूर्ण औचित्य है। यह तत्काल किया जाना चाहिए।
  •  जो राज्य राष्ट्रीय लक्ष्य से अधिक वन क्षेत्र का अपने वित्तीय स्त्रोतों से रख रखाव कर रहे हैं, उन्हें केन्द्र द्वारा प्रतिपूर्ति राशि देने के नीतिगत प्रावधान किये जाएं।
  •   थर्मल पावर निर्यातक राज्यों द्वारा भूमि व पानी जैसे संसाधन उपलब्ध कराने तथा पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव के मुआवजे के रूप में कम से कम 10 प्रतिशत मुफ्त बिजली मिले या बिजली उत्पादन पर कम से कम 4 प्रतिशत की दर से डयूटी लगाने के अधिकार संबंधित राज्यों को दिये जाए।
7.    माननीय प्रधानमंत्री जी, राज्यों के वित्तीय संसाधनों के परिप्रेक्ष्य में, मैं इस बात का भी उल्लेख करना चाहूंगा कि मूल्य सवंर्धित कर के स्थान पर वस्तु एवं सेवा कर लगाये जाने के बाबत केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच अनेक मुद्दों पर मत भिन्नता है। इस बदलाव से अनेक राज्यों और विशेषकर अविकसित राज्यों को वित्तीय हानि होगी। प्रस्तावित विधेयक के वर्तमान प्रारूप से राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता भी प्रभावित होग़ी। अत: वस्तु एवं सेवा कर संबंधी संविधान संशोधन विधेयक केन्द्र, राज्यों एवं अन्य स्टेक होल्डर्स के बीच सहमति बनाने के बाद ही पारित किया जाना चाहिये।       
8.    अंत में, मैं माननीय प्रधानमंत्री जी, परिषद के सभी माननीय सदस्यों तथा उपस्थित मित्रों का आभार व्यक्त करता हूं। मैं अपेक्षा करता हूँ कि राज्य की ओर से उठाये गये सभी बिन्दुओं और प्रस्तुत सुझावों पर केन्द्र सरकार एवं योजना आयोग सम्यक एवं सकारात्मक निर्णय लेंगे। मुझे पूर्ण आशा है कि आज के परिसंवाद के आधार पर लिये जाने वाले निर्णयों से राज्यों एवं देश के त्वरित, अधिक समावेशी एवं धारणीय विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।

 

पुन: धन्यवाद।
जय हिन्द॥



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