छत्तीसगढ़ के गोदना कलाकारों ने किया देषी-विदेषी खरीदारों को आकर्षित
भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में छत्तीसगढ़ के मंडप में अनूठी लोक कला को देखने उमड़ी भीड
रायपुर 23 नवम्बर 2011
भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले में नई दिल्ली में छत्तीसगढ़ की आदिवासी महिला हस्तषिल्प कलाकारों द्वारा कपड़ों पर की जाने वाली गोदना कला ने वहां आने वाले देषी-विदेषी खरीदारों को आकर्षित किया है। प्रगति मैदान के हॉल क्रमांक-2 में लगे छत्तीसगढ़ के मंडप में एक कोने के स्टाल में पूरी तन्मयता के साथ कपड़ों पर गोदना कला का काम करती सरगुजा के जमगाला गांव से आयी महिला शिल्पियों का काम देखते ही बनता है।
परम्परागत रूप से आदिवासी क्षेत्रों में अपने षरीर पर गोदना बनाने की कला प्रचलित है।
इन आदिवासी कलाकारों ने अब इस कला को विकसित कर कपड़ो पर उकेरना प्रारम्भ कर दिया है। प्रकृति के विभिन्न रूप, जंगल के पेड़ पौधे, पक्षी, आदिवासी नृत्य और अन्य कई विषेषताओं को समेटे यह गोदना कला साड़ियों, सलवार सूट तथा षाल की सुन्दरता में कई गुना बढ़ा देती है। सरगुजा से आई रामकली पावले बताती है कि यह परम्परा उनके परिवार में वर्षो से चली आ रही है, उनकी मॉ षरीर पर गोदना बनाती थी, उन्होंने इसमें सुधार कर इसे कपड़े पर बनाना प्रारम्भ किया और धीरे-धीरे इसे नयी कला का रूप मिल गया। उन्होंने बताया कि गोदना बनाने के लिए रंगों का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण है, वे जंगलों से इकट्ठा किये गये रंग बिरंगे फूलों और पत्तियों से मिला कर ये प्राकृतिक रंग बनाती है। रामकली की सहयोगी कलाकार सुनीता पावले बताती है कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि लोग उनकी कला को इतना पसंद करेंगे। उन्होंने बताया कि उन्होंने अब तक लगभग 40 हजार रूपए की सामग्री बेची है। वे स्थल पर ही लोगो द्वारा लाये गये मनपसंद के कपड़ों पर गोदना बना रही है।
इन कलाकारों से गोदना बनवा रही गुड़गांव से आयी ऋतु अग्रवाल ने बताया कि उन्हें यह कला बहुत पसंद आयी और उन्होंने षाल पर 800 रूपये में एक आकर्षक गोदना कला बनवायी है।

