रेशम की खेती बनेगी गांव, गरीब और किसानों की अतिरिक्त आमदनी का बेहतर जरिया
छत्तीसगढ़ के जंगलों में वर्ष 2015 तक 39 करोड़ नग टसर कोसा फलों के उत्पादन का लक्ष्य
ग्रामोद्योग विभाग के विजन 2015 को मुख्यमंत्री से मिली हरी झंडी
रायपुर, 03 जुलाई 2011

नैसर्गिक कोसे की खेती छत्तीसगढ़ के गांव, गरीब और किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का एक बेहतर जरिया साबित होने जा रही है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इसके लिए ग्रामोद्योग विभाग की ओर से प्रस्तावित ग्राम स्तरीय कार्य योजना 'विजन 2015' का अनुमोदन कर दिया है। साल, साजा, अर्जुन आदि के वृक्षों में प्राकृतिक कोसा फलों के उत्पादन, यानी रेशम की खेती के लिए राज्य सरकार के ग्रामोद्योग विभाग के रेशम संचालनालय ने मुख्यमंत्री से हरी झंडी मिलते ही अपनी इस कार्य-योजना पर अमल शुरू कर दिया है।
विभागीय अधिकारियों ने आज यहां बताया कि रेशम संचालनालय के सहयोग से राज्य के जंगलों में इन वृक्षों पर कोसा कृमि पालन के जरिए वर्तमान में लगभग 14 करोड़ नग नैसर्गिक कोसा फलों की पैदावार ग्रामीणों द्वारा ली जा रही है। विभाग द्वारा तैयार कार्य-योजना 'विजन 2015' के अंतर्गत आगामी वर्ष 2015 तक प्रदेश के वनों में नैसर्गिक कोसा उत्पादन का यह लक्ष्य 39 करोड़ नग तक बढ़ाने का लक्ष्य है। इस लक्ष्य के अनुसार लगभग एक लाख 31 हजार ग्रामीण परिवारों को इन कोसा फलों के संग्रहण से अच्छी अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होगी। प्रमुख सचिव ग्रामोद्योग श्री पी. रमेश कुमार ने विभागीय अधिकारियों को 'विजन 2015' की कार्य योजना में जिलेवार लक्ष्य भी आवंटित कर दिया है। रायपुर संभाग में भी इस पर अमल शुरू हो गया है।
अधिकारियों ने बताया कि कार्य-योजना के तहत वर्ष 2015 तक संभाग के रायपुर जिले में 50 लाख नग, कबीरधाम (कवर्धा) जिले में भी 50 लाख नग, धमतरी जिले में 40 लाख नग, दुर्ग जिले में 25 लाख नग, महासमुंद जिले में 15 लाख नग, प्राकृतिक कोसा फलों के उत्पादन का लक्ष्य है। इनसे निर्मित होने वाले कोसे अथवा रेशम को टसर के नाम से जाना जाता है। टसर कोसा कृमि पालन के लिए रेशम संचालनालय के अधिकारी संबंधित जिलों के वन-खंडों में शिविर लगाकर ग्रामीणों को साल, साजा, अर्जुन आदि के पेड़ों पर रेशम अथवा कोसा के कीड़े पालने का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि ये वृक्ष रेशम कीड़ों के प्राकृतिक भोजन का मुख्य आधार होते हैं। इन पेड़ों पर रेशम कीड़ों के बीज छोड़े जा रहे हैं। इनसे निर्मित कोसा फलों से नर और मादा तितलियां निकल रही है,
जिनके युग्मन के बाद मादा तितलियों द्वारा दिए जाने वाले अंडों को इन खाद्य वृक्षों में टांगा जा रहा है और मादा तितलियों को अधिक से अधिक अंड़े देने के लिए वनों में छोड़ा जा रहा है। रायपुर जिले के ग्राम जमाही और पक्तिया, जिला महासमुंद के जामगांव, सिर्री और मोहंदी, जिला धमतरी के जी-जामगांव, जिला दुर्ग के ग्राम केसरा और जिला राजनांदगांव के ग्राम खरकाटोला तथा कुड़ेझर में डाबा प्रजाति के कोसा के फल तैयार होंगे।
रेशम संचालनालय के अधिकारियों के अनुसार इन गांवों के वनखंडों में शिविर पिछले माह आयोजित किया गया, जहां साजा, अर्जुन और सेन्हा के पेड़ों पर टसर कोसा कृमि पालन के लिए अंडे छोड़े गए। कबीरधाम (कवर्धा) जिले के ग्राम सिवनी कला के वनखंड में साल के वृक्षों पर रैली प्रजाति के कोसे के कीड़े पालने के लिए इस वर्ष विगत अप्रैल में ग्रामीणों को शिविर लगाकर जानकारी दी गई। अधिकारियों ने बताया कि डाबा प्रजाति के कोसे की तितलियां लगभग 150 से 180 तक तथा रैली प्रजाति की मादा तितलियां 350 से 400 सौ तक अंडे देती हैं। इन अंडों से निकले नवजात कृमि अपने इन खाद्य वृक्षों की पत्तियों को भोजन के रूप में ग्रहण कर एक माह से डेढ़ माह के भीतर अपना जीवन चक्रपूर्ण करते हुए कोसा फल तैयार करते हैं, जिसे ग्रामीण संग्राहक इन वृक्षों से तोड़ कर आसपास के साप्ताहिक हाट-बाजारों में उनकी बिक्री करते हैं, इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है। इन कोसा फलों से धागाकरण के जरिए रेशमी धागे निकाले जाते हैं, जिनसे हाथ करघों और बिजली से चलने वाले करघों के द्वारा बुनकर कोसे के कलात्मक कपड़े तैयार करते हैं।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि विजन 2015 की कार्य-योजना में नैसर्गिक कोसा कृमि पालन के जरिए राज्य में कोसा फलों की पैदावार 39 करोड़ नग तक बढ़ाने का लक्ष्य है। इससे इन कोसा फलों का संग्रहण करने वाले ग्रामीणों की आमदनी में भी इजाफा होगा। चालू वित्तीय वर्ष 2011-12 में रेशम संचालनालय ने रायपुर संभाग के 20 गांवों के वन खंड़ों में नैसर्गिक कोसा उत्पादन में वृध्दि के लिए प्रगुणन शिविर आयोजित करने का निर्णय लिया है। ये शिविर रायपुर जिले के ग्राम धवलपुर, नवागढ़, तौरंगा और इल्दागांव, जिला धमतरी के ग्राम दुगली, लीलांज, छाती और जी-जामगांव, जिला कबीरधाम के ग्राम खिलाही, सोनवाही, तुरैयाबाहरा, केरानार, संभूपीपर, सिवनी कला और मावलीघाट, जिला राजनांदगांव के ग्राम साल्हेवार तथा जिला दुर्ग के ग्राम पेटेचुवा सहित विकासखंड गुंडरदेही, बालोद और पाटन के तीन गांवों में लगाए जाएंगे।
विभागीय अधिकारियों ने आज यहां बताया कि रेशम संचालनालय के सहयोग से राज्य के जंगलों में इन वृक्षों पर कोसा कृमि पालन के जरिए वर्तमान में लगभग 14 करोड़ नग नैसर्गिक कोसा फलों की पैदावार ग्रामीणों द्वारा ली जा रही है। विभाग द्वारा तैयार कार्य-योजना 'विजन 2015' के अंतर्गत आगामी वर्ष 2015 तक प्रदेश के वनों में नैसर्गिक कोसा उत्पादन का यह लक्ष्य 39 करोड़ नग तक बढ़ाने का लक्ष्य है। इस लक्ष्य के अनुसार लगभग एक लाख 31 हजार ग्रामीण परिवारों को इन कोसा फलों के संग्रहण से अच्छी अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होगी। प्रमुख सचिव ग्रामोद्योग श्री पी. रमेश कुमार ने विभागीय अधिकारियों को 'विजन 2015' की कार्य योजना में जिलेवार लक्ष्य भी आवंटित कर दिया है। रायपुर संभाग में भी इस पर अमल शुरू हो गया है।
अधिकारियों ने बताया कि कार्य-योजना के तहत वर्ष 2015 तक संभाग के रायपुर जिले में 50 लाख नग, कबीरधाम (कवर्धा) जिले में भी 50 लाख नग, धमतरी जिले में 40 लाख नग, दुर्ग जिले में 25 लाख नग, महासमुंद जिले में 15 लाख नग, प्राकृतिक कोसा फलों के उत्पादन का लक्ष्य है। इनसे निर्मित होने वाले कोसे अथवा रेशम को टसर के नाम से जाना जाता है। टसर कोसा कृमि पालन के लिए रेशम संचालनालय के अधिकारी संबंधित जिलों के वन-खंडों में शिविर लगाकर ग्रामीणों को साल, साजा, अर्जुन आदि के पेड़ों पर रेशम अथवा कोसा के कीड़े पालने का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि ये वृक्ष रेशम कीड़ों के प्राकृतिक भोजन का मुख्य आधार होते हैं। इन पेड़ों पर रेशम कीड़ों के बीज छोड़े जा रहे हैं। इनसे निर्मित कोसा फलों से नर और मादा तितलियां निकल रही है,
जिनके युग्मन के बाद मादा तितलियों द्वारा दिए जाने वाले अंडों को इन खाद्य वृक्षों में टांगा जा रहा है और मादा तितलियों को अधिक से अधिक अंड़े देने के लिए वनों में छोड़ा जा रहा है। रायपुर जिले के ग्राम जमाही और पक्तिया, जिला महासमुंद के जामगांव, सिर्री और मोहंदी, जिला धमतरी के जी-जामगांव, जिला दुर्ग के ग्राम केसरा और जिला राजनांदगांव के ग्राम खरकाटोला तथा कुड़ेझर में डाबा प्रजाति के कोसा के फल तैयार होंगे।रेशम संचालनालय के अधिकारियों के अनुसार इन गांवों के वनखंडों में शिविर पिछले माह आयोजित किया गया, जहां साजा, अर्जुन और सेन्हा के पेड़ों पर टसर कोसा कृमि पालन के लिए अंडे छोड़े गए। कबीरधाम (कवर्धा) जिले के ग्राम सिवनी कला के वनखंड में साल के वृक्षों पर रैली प्रजाति के कोसे के कीड़े पालने के लिए इस वर्ष विगत अप्रैल में ग्रामीणों को शिविर लगाकर जानकारी दी गई। अधिकारियों ने बताया कि डाबा प्रजाति के कोसे की तितलियां लगभग 150 से 180 तक तथा रैली प्रजाति की मादा तितलियां 350 से 400 सौ तक अंडे देती हैं। इन अंडों से निकले नवजात कृमि अपने इन खाद्य वृक्षों की पत्तियों को भोजन के रूप में ग्रहण कर एक माह से डेढ़ माह के भीतर अपना जीवन चक्रपूर्ण करते हुए कोसा फल तैयार करते हैं, जिसे ग्रामीण संग्राहक इन वृक्षों से तोड़ कर आसपास के साप्ताहिक हाट-बाजारों में उनकी बिक्री करते हैं, इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी प्राप्त होती है। इन कोसा फलों से धागाकरण के जरिए रेशमी धागे निकाले जाते हैं, जिनसे हाथ करघों और बिजली से चलने वाले करघों के द्वारा बुनकर कोसे के कलात्मक कपड़े तैयार करते हैं।
अधिकारियों ने यह भी बताया कि विजन 2015 की कार्य-योजना में नैसर्गिक कोसा कृमि पालन के जरिए राज्य में कोसा फलों की पैदावार 39 करोड़ नग तक बढ़ाने का लक्ष्य है। इससे इन कोसा फलों का संग्रहण करने वाले ग्रामीणों की आमदनी में भी इजाफा होगा। चालू वित्तीय वर्ष 2011-12 में रेशम संचालनालय ने रायपुर संभाग के 20 गांवों के वन खंड़ों में नैसर्गिक कोसा उत्पादन में वृध्दि के लिए प्रगुणन शिविर आयोजित करने का निर्णय लिया है। ये शिविर रायपुर जिले के ग्राम धवलपुर, नवागढ़, तौरंगा और इल्दागांव, जिला धमतरी के ग्राम दुगली, लीलांज, छाती और जी-जामगांव, जिला कबीरधाम के ग्राम खिलाही, सोनवाही, तुरैयाबाहरा, केरानार, संभूपीपर, सिवनी कला और मावलीघाट, जिला राजनांदगांव के ग्राम साल्हेवार तथा जिला दुर्ग के ग्राम पेटेचुवा सहित विकासखंड गुंडरदेही, बालोद और पाटन के तीन गांवों में लगाए जाएंगे।
क्रमांक/1528/स्वराजय

