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मुख्यमंत्री भाषण नई दिल्ली- दिनांक 06 फरवरी 2010

माननीय प्रधानमंत्री जी, माननीय कृषि मंत्री जी, माननीय मुख्यमंत्रीगण एवं उपस्थित महानुभावों,

सबसे पहले मैं माननीय प्रधानमंत्री जी एवं कृषि मंत्री जी को धन्यवाद देना चाहता हूं कि आपने इस सम्मेलन के माध्यम से आम आदमी से जुड़ी देश की सबसे बड­ी समस्या पर विचार-विमर्श में शामिल होने का मौका हमें दिया है। कृषि की स्थिति और आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में गहरा रिश्ता है। मूल्यों का संबंध शासन, प्रशासन की नीति-रीति तथा बाजार को प्रभावित करने वाले अनेक पहलुओं से भी है। मुझे खुशी है कि इस बैठक के माध्यम से हम छत्तीसगढ़ में किए गए उपायों तथा केन्द्र शासन से हमारी अपेक्षाओं के बारे में भी चर्चा कर सकेंगे।

माननीय, आपको विदित ही हैं कि छत्तीसगढ़ में हमने सार्वजनिक वितरण प्रणाली के सुदृढ़ीकरण के अभिनव उपाय किए हैं, जिसका अध्ययन समय-समय पर केन्द्र एवं अन्य राज्यों के विशेषज्ञ दलों द्वारा भी किया गया है। इसी तरह हमने राज्य में खाद्यान्न सुरक्षा के कारगर उपाय भी किए हैं, जिसके कारण हमारे राज्य की लगभग आधी गरीब आबादी को महंगाई के इस दौर में काफी राहत मिली है। आप सहमत होंगे कि खुले बाजार में आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में होने वाली वृध्दि से देश के गरीब एवं अन्त्योदय परिवारों को सुरक्षित रखने का एक मात्र विकल्प हमारी सार्वजनिक वितरण प्रणाली है। किन्तु यह अत्यन्त दुख का विषय है कि देश में गरीबों की वास्तविक संख्या का निर्धारण करने में भी हम लोग पूरी तरह से सफल नहीं रहे हैं, जिसके कारण हम प्रत्येक गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति को लाभ पहुंचाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। फिलहाल योजना आयोग द्वारा छत्तीसगढ़ में मात्र 42.5 प्रतिशत परिवारों को गरीब मानकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से राशन सामग्री के वितरण की अनुमति दे रहा है, जबकि डॉ. एन.सी. सक्सेना की रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ में 73 प्रतिशत परिवारों को गरीबी रेखा के नीचे बताया गया है। योजना आयोग द्वारा राज्य में गरीबी का सही आकलन नहीं कर पाने के कारण राज्य शासन को स्वयं के संसाधन से अतिरिक्त गरीब परिवारों को मात्र 2 रूपये किलो की दर से खाद्यान्न उपलब्ध कराना पड़ रहा है जिसके लिए मेरी सरकार हर साल लगभग 1200 करोड़ रूपये व्यय कर रही है। देश में गरीबी के आकलन के संबंध में डॉ. एन.सी. सक्सेना की रिपोर्ट यथार्थ के काफी करीब लगती है। अत: आपसे अनुरोध है कि इस रिपोर्ट के आधार पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए बीपीएल परिवारों का
निर्धारण कर खाद्यान्न का आबंटन जारी किया जाये। इसके अलावा एपीएल परिवारों के लिए 35 किलो खाद्यान्न का आबंटन प्रतिमाह जारी किया जाये और छत्तीसगढ़ राज्य का 61,000 टन एपीएल चावल का मासिक कोटा बहाल किया जाये। साथ ही भारत सरकार के प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम में देश के सभी बीपीएल परिवारों के लिए प्रतिमाह कम से कम 35 किलो खाद्यान्न की पात्रता निर्धारित की जाए।
भारत सरकार द्वारा जनवरी माह में एपीएल, बीपीएल एवं अन्त्योदय अन्न योजना के कार्डधारियों के लिए 44,110 टन खाद्यान्न का अतिरिक्त आबंटन जारी किया गया है। किन्तु भारतीय खाद्य निगम से राज्य शासन द्वारा उठाव किये जाने वाले गेहूं की प्रदाय दर 10.80 रूपये प्रति किलो तथा चावल की प्रदाय दर लगभग 15 रूपये प्रति किलो रखी गई है। ऐसी स्थिति में इस खाद्यान्न के परिवहन एवं उचित मूल्य दुकान के कमीशन को जोड़ने के बाद यह काफी अधिक मूल्य पर उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध होगा। आपसे अनुरोध है कि इसे एपीएल की प्रदाय दर पर राज्य को उपलब्ध कराया जाये और इसका आबंटन साल भर जारी रखा जाये।
इस वित्तीय वर्ष के दौरान दिसंबर माह तक बीपीएल एवं अंत्योदय योजना में 99 प्रतिशत चावल का उठाव हुआ है। छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा पीडीएस को मजबूत बनाने के लिए अनेक उपाय किये हेै, जिनका जिक्र मैं करना चाहूंगा। हमने निजी व्यक्तियों को दुकान संचालन से प्रतिबंधित कर दुकानें ग्राम पंचायतों,सहकारी समितियों, महिला स्व-सहायता समूहों को आबंटित की है। ग्राम पंचायतों तथा महिला स्व-सहायता समूहों को दुकान संचालन हेतु 75,000 रूपये की कार्यशील पूंजी के रूप में 42 करोड़ का ऋण दिया है। राज्य की सभी 10518 राशन दुकानों को द्वार प्रदाय योजना के द्वारा खाद्यान्न प्रदाय किया जा रहा है। सभी 18 जिलों की उचित मूल्य दुकानों को एक माह की राशन सामग्री के्रडिट में प्रदाय की जा रही है। जनवरी, 2008 से पीडीएस के आबंटन एवं दुकानों को राशन सामग्री का ऑनलाईन प्रदाय हो रहा है और सभी 36.16 लाख राशनकार्डधारियों का विवरण आम लोगों हेतु ऑनलाईन उपलब्ध है। सभी दुकानों में माह की सात तारीख के पूर्व राशन सामग्री का अग्रिम भंडारण, सभी राशन दुकानों में प्रत्येक माह चावल उत्सव के द्वारा वितरण के सोशल ऑडिट की व्यवस्था की गई है। इस वर्ष 1.16 लाख डुप्लीकेट, बोगस राशनकार्ड निरस्त किये गये हैं। राज्य शासन द्वारा प्रदेश के सभी 36 लाख गरीब परिवारों को प्रतिमाह दो किलो नि:शुल्क नमक पीडीएस के द्वारा वितरित किया जा रहा है। धान और चावल उपार्जन की समस्त प्रक्रिया का कम्प्यूटरीकरण कर दिया गया है और पीडीएस के राशन प्रदाय की जानकारी आम नागरिकों को उपलब्ध कराने हेतु मोबाईल पर एसएमएस सुविधा के साथ पीडीएस से संबंधित सुझाव और शिकायतों हेतु कॉल सेन्टर का संचालन किया जा रहा है, जिसके द्वारा अब तक कुल 3,920 शिकायतें दर्ज तथा 3,668 शिकायतें निराकृत की जा चुकी है। मात्र पीडीएस से संबंधित सुझाव और शिकायत हेतु जन भागीदारी वेबसाईट भी संचालित है। भारत सरकार छत्तीसगढ़ राज्य में पीडीएस के सुदृढीकरण हेतु किये गये उपायों से प्रभावित होकर पीडीएस कम्प्यूटरीकरण्ा कार्य हेतु राज्य के तीन जिलों में पायलेट हेतु चिन्हांकन किया है। इस वित्तीय वर्ष में दिसंबर, 2009 तक पीडीएस की राशन सामग्री के दुरूपयोग के 44 प्रकरणों में दोषियों के विरूध्द एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई है और 5.4 करोड़ रूपए मूल्य की आवश्यक वस्तुएं जप्त कर 65 उचित मूल्य दुकानों को निरस्त भी किया गया है।   
छत्तीसगढ़ राज्य में शक्कर पर वैट शुल्क लागू नहीं है और शक्कर में पूर्व में लागू प्रवेश कर भी राज्य शासन द्वारा हटा लिया गया है। जुलाई, 2002 के पूर्व तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से बी.पी.एल. के साथ-साथ ए.पी.एल. वर्ग के लोगों को भी शक्कर प्राप्त हो जाती थी। इससे समाज के अधिकांश वर्ग की शक्कर की आवश्यकता की पूर्ति पीडीएस के माध्यम से सुनिश्चित हो जाती थी। वर्तमान में शक्कर के मूल्यों में हो रही वृध्दि पर प्रभावी नियंत्रण के लिए आवश्यक है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली के
माध्यम से ए.पी.एल.वर्ग के लोगों को भी शक्कर प्रदाय की जाए।
सार्वजनिक वितरण प्रणाली की शक्कर के प्रदाय के बिन्दु पर भी आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ। मेरे राज्य को प्रतिमाह 4600 टन लेव्ही शक्कर की आवश्यकता होती है। किन्तु देश की शक्कर मिलों द्वारा पीडीएस के लिए शक्कर नियमित रूप से प्रदाय नहीं की जा रही है। अप्रेैल, 2009 से जनवरी, 2010 तक शक्कर के कुल 62,875 टन आबंटन के विरूध्द महाराष्ट्र की शक्कर मिलों द्वारा मात्र 39,481 टन शक्कर प्रदाय की गई है। ऐसी स्थिति में पीडीएस के उपभोक्ता भी खुले बाजार से शक्कर क्रय करने हेतु बाध्य हो रहे हैं एवं शक्कर के मूल्यों में अनावश्यक वृध्दि हो रही है। इसे रोकने के लिए भारत सरकार के शुगर कंट्रोल आर्डर, 1966 में आवश्यक
संशोधन कर शक्कर मिलों के लिए लेव्ही की पात्रता बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर देना उचित होगा।
इस वर्ष छत्तीसगढ़ राज्य में समर्थन मूल्य पर 42 लाख टन
धान की खरीदी का अनुमान है। अब तक 38.50 लाख टन धान खरीदा जा चुका है और इसमें से 14.50 लाख टन धान की मिलिंग भी पूरी हो गई है। समर्थन मूल्य पर धान उपार्जन और धान की कस्टम मिलिंग के संबंध में राज्य से संबंधित महत्वपूर्ण समस्याओं की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हॅूं। इस वर्ष भारतीय खाद्य निगम का पर्याप्त सहयोग नहीं मिलने के कारण धान की मिलिंग का कार्य प्रभावित हो रहा है। इसलिए मेरा अनुरोध है कि विगत वर्षों की भांति भारतीय खाद्य निगम द्वारा राज्य शासन से कम से कम 10 लाख मेट्रिक टन धान प्राप्त कर उसकी मिलिंग कराई जाये। सेन्ट्रल पूल के लिए प्राप्त किये जाने वाले चावल में 75 प्रतिशत उसना एवं 25 प्रतिशत अरवा चावल लिया जाये। भारतीय खाद्य निगम द्वारा राज्य से प्रतिमाह न्यूनतम 4 लाख टन चावल अन्य राज्यों हेतु परिवहन कराया जाये ताकि चावल के भंडारण के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध रहे। छत्तीसगढ राज्य के लिए अरवा मिलिंग चार्ज बढ़ाकर 45 रूपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया जाये और अरवा मिलिंग हेतु चावल की झड़ती 67 प्रतिशत के बजाय 65 प्रतिशत की जाये।
देश में इस वर्ष खराब मानसून के कारण चावल के उत्पादन में कमी आई है और भारत सरकार को अधिक मात्रा में चावल प्राप्त करना है। इस कार्य में छत्तीसगढ़ राज्य पर्याप्त सहायता कर सकता है। भारतीय खाद्य निगम द्वारा राज्य में अधिक मात्रा में उसना चावल लेने पर राज्य में 40 लाख टन चावल प्राप्त किया जा सकता है। इसके अलावा राज्य में उत्पादित ग्रीष्मकालीन धान की उसना लेव्ही लिये जाने पर भारतीय खाद्य निगम को अतिरिक्त उसना चावल प्राप्त हो सकता है।
देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में विकेन्द्रीकृत उपार्जन योजना की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है लेकिन यह बहुत दुखद है कि इस योजना में कुछ भी विकेन्द्रीकृत नहीं है। धान की मिलिंग की अवधि, ब्याज और भण्डारण व्यय, परिवहन व कस्टम मिलिंग चार्ज, खाद्य सब्सिडी के भुगतान की प्रक्रिया, चावल की अंतिम इकॉनामिक कॉस्ट के निर्धारण हेतु मानदण्ड आदि सभी कुछ भारत सरकार द्वारा तय किया जा रहा है। इस वर्ष इसमें और आगे बढ़कर भारतीय खाद्य निगम द्वारा प्राप्त किये जाने वाले चावल की मात्रा में अरवा और उसना चावल का अनुपात भी तय किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में राज्य शासन के लिए यह योजना विकेन्द्रीकृत नहीं रह गई है और राज्य शासन के प्रस्तावों को विशेष महत्व नहीं मिल रहा है। धान की मिलिंग हेतु दो माह की औसत अवधि तय की गई है जबकि मेरे राज्य में किसी भी स्थिति में धान की मिलिंग दो माह में पूर्ण होना संभव नहीं इसलिए इसे बढ़ाकर कम से कम चार माह किया जाना चाहिए।
विकेन्द्रीकृत उपार्जन योजना की सफलता इसके बेहतर वित्तीय प्रबंधन और राज्यों को खाद्य सब्सिडी की राशि के त्वरित भुगतान पर निर्भर करती है, किन्तु भारत सरकार से खाद्य सब्सिडी की अग्रिम राशि प्राप्त होने में प्राय: विलंब होता है, जिससे राज्य शासन पर अनावश्यक ब्याज भार बढ़ रहा है। मेरे राज्य को भारत सरकार से   वर्तमान वित्तीय वर्ष 2009-10 की खाद्य सब्सिडी की 781 करोड़ रूपये की राशि प्राप्त करना है। खाद्य सब्सिडी प्राप्ति की प्रक्रिया का सरलीकरण किया जाना अत्यन्त आवश्यक है। चूंकि राज्य शासन द्वारा स्वयं धान एवं चावल का उपार्जन एवं वितरण किया जा रहा है अत: उन्हें होने वाली समस्त हानि की प्रतिपूर्ति केन्द्र को उसी प्रकार करना चाहिए जैसे भारतीय खाद्य निगम को की जाती है।
माननीय प्रधानमंत्री महोदय, भारत सरकार द्वारा खाद्य सब्सिडी की अधिकतम 95 प्रतिशत राशि रिलीज की जाती है और शेष 5 प्रतिशत राशि धान और चावल के आडिटेड एकाउंट भारत सरकार को प्रस्तुत किये जाने के उपरांत जारी किये जाने का प्रावधान है। खरीफ वर्ष 2006-07 तक के धान/चावल उपार्जन के लेखों का अंकेक्षण कराकर चावल की इकानामिक कॉस्ट के निर्धारण हेतु भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा जा चुका है। चावल की इकॉनामिक कास्ट के अंतिम निर्धारण में भारत सरकार द्वारा ब्याज, भंडारण, परिवहन आदि सभी मदों में कटौती की जा रही है, जिससे राज्य को
अत्यधिक हानि होगी। साथ ही वर्ष 2001-02 से लेकर 2006-07 तक के प्रस्ताव भारत सरकार के समक्ष लंबित होने के कारण राज्य को प्राप्ति योग्य 5 प्रतिशत खाद्य सब्सिडी की लगभग 330 करोड़ रूपये की राशि का भुगतान भी लंबित है। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन से लेकर अब तक धान और चावल उपार्जन में 2296 करोड़ की हानि हो चुकी है, जिसमें से सिर्फ ब्याज मद में 1344 करोड़ की हानि हुई है। इससे स्पष्ट है कि विकेन्द्रीकृत उपार्जन योजना हेतु राज्यों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने के कारण राज्य सरकार की संस्थाएं भारी ब्याज चुका रही हैं। यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती है और छत्तीसगढ़ राज्य को अंतत: आर्थिक मजबूरी के चलते इस योजना से अलग होना पड़ सकता है।
खाद्यान्न के उपार्जन हेतु भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ऊंची ब्याज दर (11.25 प्रतिशत) पर ऋण दिया जा रहा है। यह ब्याज दर न केवल चक्रवृध्दि ब्याज दर है बल्कि इसकी गणना मासिक आधार पर की जाती है। भारतीय रिजर्व बैंक की ऊंची ब्याज दर के कारण खाद्यान्न की इकॉनामिक कॉस्ट में वृध्दि हो रही है, जो कि खुले बाजार में मूल्य वृध्दि का एक प्रमुख कारण है और साथ ही राज्यों को खाद्यान्न उपार्जन में होने वाली हानि का भी सबसे प्रमुख कारण है। यदि हम देश में सचमुच खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ करना चाहते हैं तो सबसे पहले भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा खाद्यान्न उपार्जन हेतु
4 प्रतिशत सामान्य ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाना होगा।
खाद्यान्न के स्टॉक के मूल्यांकन के संबंध में मैं बताना चाहूंगा कि भारत सरकार से खाद्य सब्सिडी की राशि प्राय: विलंब से प्राप्त होती है इसलिए प्राप्ति योग्य राशि को धान और चावल के स्टॉक के विरूध्द भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा मान्य किया जाना चाहिए। किन्तु ऐसा नहीं किया जा रहा है और केवल इस आधार पर राज्य की एजेंसी के धान और चावल के स्टॉक मूल्यांकन में अनियमितता दर्शाकर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अब तक 62 करोड़ रूपये का दण्ड ब्याज वसूल किया गया है। ऐसे सारे बैकिंग नियमों को खाद्यान्न उपार्जन के मामलों में लागू नहीं किया जाना चाहिए अथवा इस दण्ड ब्याज का भी भुगतान भारत सरकार द्वारा किया जाना चाहिए।
छत्तीसगढ़ राज्य में छत्तीसगढ़ राज्य भंडार गृह निगम की स्व निर्मित एवं किराये पर ली गई भंडारण क्षमता 10.4 लाख टन, एफसीआई की 5.12 लाख टन तथा केन्द्रीय भंडार गृह निगम की
2.46 लाख टन है। राज्य की कुल भंडारण्ा क्षमता लगभग 18 लाख टन है। भारतीय खाद्य निगम की आरक्षण गारंटी योजना के अंतर्गत राज्य के लिए मात्र 5000 टन के गोदाम प्रस्तावित हैं। हमारा प्रस्ताव है कि राज्य में न्यूनतम 5 लाख टन क्षमता को गोदाम निर्माण कराया जाए।
राज्य सरकार द्वारा प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन में वृध्दि हेतु अनेक कार्य किये जा रहे हैं। प्रदेश सरकार ने किसानों के हित में एक बड़ा कदम उठाते हुए 3 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर कृषि ऋण लेना प्रारंभ किया है। यह दर आज से 6 वर्ष पूर्व 14 प्रतिशत थी। इस वर्ष किसानों को 1200 रूपये करोड़ की राशि कृषि ऋण के रूप में तीन प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर दी गई है। पिछले चार वर्षों में प्रदेश में सिंचाई पंपों की संख्या दुगुनी हो गई है तथा सभी को विद्युत कनेक्शन दिये गये हैं। 5 हार्स पावर के सिंचाईं पंपों पर 6,000 यूनिट तक मुफ्त बिजली प्रदाय की व्यवस्था की गई है। प्रदेश सरकार के इन कदमों से कृषि लाभप्रद हुई हेै, जिसका नतीजा यह हुआ है कि प्रदेश सेन्ट्रल पूल हेतु चावल उपार्जन में देश में चौथे स्थान पर आ गया है।
प्रदेश के सिंचित क्षेत्र में विस्तार हेतु राज्य शासन द्वारा लघु एवं सीमान्त कृषकों के लिये सिंचाई कूप एवं पंप हेतु शाकम्भरी योजना प्रारंभ की गई है। विगत 5 वर्षों में राज्य में लगभग 1,20,000 सिंचाई पंपों का ऊर्जीकरण, लगभग 45 हजारी नलकूपों का खनन एवं लगभग 35 हजार सिंचाई पंपों पर कृषकों को अनुदान उपलब्ध कराया गया है। राज्य शासन द्वारा कृषि यंत्रों पर वैट समाप्त कर दिया गया है तथा कुछ महत्वपूर्ण कृषि उपकरण्ा यथा पावर टिलर, रोटावेटर, जीरोसीडड्रील आदि उपकरण 80 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराया जा रहा है। केन्द्र प्रवर्र्तित मैक्रोमैनेजमेंट योजना के अंतर्गत उन्नत कृषि यंत्रों पर देय 25 प्रतिशत अनुदान के अतिरिक्त 25 प्रतिशत राज्य अनुदान भी दिया जा रहा है। राज्य में सिचाई जल के बेहतर उपयोग एवं नगदी फसलों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्प्रिंकलर एवं ड्रिप को बढ़ावा देने हेतु केन्द्रीय अनुदान के अतिरिक्त लघु एवं सीमान्त कृषकों को 30 प्रतिशत एवं अन्य कृषकों को 10 प्रतिशत का अतिरिक्त अनुदान राज्य शासन द्वारा दिया जा रहा है। खरीफ फसलों के लिए उर्वरकों की आपूर्ति में भी वृध्दि की गई है। प्रदेश के सभी जिलों में कृषि विज्ञान केन्द्र प्रारंभ किया जा चुका है। प्रदेश में किसान काल सेंटर एवं सामुदायिक रेडियो के माध्यम से कृषकों को तकनीकी जानकारी एवं सामयिक सलाह दी जा रही है। पशु आहार पर भी राज्य में वैट शुल्क लागू नहीं है।
प्रदेश में खाद्यान्न का उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने हेतु किये गये विशेष प्रयासों से दो फसली क्षेत्रों में पिछले पांच वर्षों में पूर्व की तुलना में 85 प्रतिशत की वृध्दि हुई है। दलहन फसलों के क्षेत्रफल में 44 प्रतिशत तथा तिलहन फसलों के क्षेत्रफल में 122 प्रतिशत वृध्दि हुई है। सोयाबीन की फसल पिछले पांच वर्षों में 66 प्रतिशत बढ़कर 1.36 लाख टन तक पहुंच गई है। राज्य में विगत 5 वर्षों में बीज उत्पादन के कार्यक्रम में 574 प्रतिशत एवं वितरण में 614 प्रतिशत की वृध्दि हुई है। उर्वरक की खपत 54 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़कर लगभग 95 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गई है।
राज्य स्थापना के समय राज्य में एक भी शक्कर कारखाना नहीं था हमारे विशष प्रयासों से राज्य में अब तीन शक्कर कारखाने स्थापित कर लिये गये हैं। गन्ने के क्षेत्र विस्तार एवं उत्पादकता में वृध्दि हेतु गन्ना उत्पादक किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए भारत सरकार द्वारा गन्ने हेतु निर्धारित मूल्य के अतिरिक्त 25 रूपये प्रति क्विंटल बोनस तथा परिवहन अनुदान भी दिया जा रहा है।
हमारा प्रस्ताव है कि राज्य में सिचाई सुविधाओं को बढ़ाने के उद्देश्य से केन्द्र प्रवर्तित त्वरित सिंचाई लाभ योजना के अंतर्गत गैर अनुसूचित क्षेत्रों में भी 90 प्रतिशत अनुदान भारत सरकार द्वारा उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
राज्य में आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी एवं जमाखोरी पर नियंत्रण हेतु छत्तीसगढ़ आवश्यक वस्तु व्यापारी (अनुज्ञापन तथा जमाखोरी पर निर्बंधन), आदेश, 2009 राज्य में अगस्त, 2009 से प्रभावशील है, जिसके द्वारा चावल के लिए 2,000 क्विटल, दाल के लिए 1,000 क्विंटल, तिलहन के लिए 1,000 क्विंटल, खाद्य तेल के लिए 500 क्विंटल और शक्कर के लिए अधिकतम 2,000 क्विंटल स्टॉक लिमिट तय किया गया है। इस आदेश के राज्य में लागू होने के उपरांत मारे गये छापों में कुल 46 प्रकरण निर्मित किये गये हैं और 86,751 क्विंटल दाल, 6,345 क्विंटल खाद्य तेल एवं 9,497 क्विंटल शक्कर जब्त की गई है।
आवश्यक वस्तुओं के व्यापार में वायदा कारोबार के कारण भी राज्यों के लिए आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। इसलिए हमारा प्रस्ताव है कि गेहूं, चावल, दलहन, शक्कर, खाद्यतेल जैसी आवश्यक वस्तुओं का वायदा कारोबार तत्काल प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए।
सामान्यत: अधिकांश आवश्यक वस्तुओं के थोक भाव में कमी आने के बावजूद रिटेल भाव में तुरन्त कमी नहीं आती है। इसका प्रमुख कारण व्यापारियों द्वारा अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति के साथ-साथ इसके नियंत्रण्ा के लिए कानून का नहीं होना है। इसलिए राज्य शासन का प्रस्ताव है कि आवश्यक वस्तुओं के थोक एवं रिटेल व्यापारियों हेतु लाभ का मार्जिन तय किये जाने हेतु नियंत्रण आदेश भारत सरकार द्वारा जारी किया जाए अथवा राज्यों को इस संबंध में अधिकार दिया जाए। इस संबंध में छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा भारत सरकार को प्रस्ताव दिया गया है।
इस वित्तीय वर्ष में दिसंबर, 2009 तक आवश्यक वस्तु
अधिनियम के अंतर्गत मारे गये 751 छापे में 36 व्यक्ति गिरतार किये गये और 80 व्यक्ति अभियोजित तथा 66 व्यक्ति दोष सिध्द हुए हैं। साथ ही 1,16,092 क्विंटल खाद्यान्न जब्त किया गया। राज्य शासन का प्रस्ताव है कि पीडीएस से संबंधित आवश्यक वस्तुओं का दुरूपयोग करने संबंधी अपराधों के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 10 (क) को गैर जमानती बनाया जाये। इस संबंध में राज्य शासन की ओर से भारत सरकार को प्रस्ताव भेजा गया है।
भारत सरकार द्वारा खुले बाजार में आवश्यक वस्तुओं की मूल्य वृध्दि पर नियंत्रण हेतु प्रारंभ की गई योजनाओं के संबंध में जिक्र करना चाहूगा। भारत सरकार द्वारा गेहूं एवं चावल के मूल्यों में वृध्दि को रोकने हेतु भारतीय खाद्य निगम के पास उपलब्ध गेहूं एवं चावल को खुले बाजार में बेचने की योजना बनाई गई है। भारतीय खाद्य निगम द्वारा इस योजना के द्वारा उपलब्ध कराये जा रहे गेहूं एवं चावल के परिवहन एवं अन्य व्ययों को जोड़कर राशन दुकान में गेहूं की उपभोक्ता दर लगभग 14 रूपये किलो और चावल की उपभोक्ता दर लगभग 17 रूपये प्रति किलों हो रही है। खुले बाजार में
उपलब्ध गेहूं एवं चावल की रिटेल दर से पर्याप्त अंतर न होने के कारण इस योजना के खाद्यान्न के विक्रय में भी समस्या हो रही है। इस योजना के द्वारा गेहूं 8 रूपये किलो तथा चावल 10 रूपये किलो की दर से राज्यों को उपलब्ध कराये जाने से ही यह योजना सफल हो सकती है।
केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रही सब्सिडी युक्त खाद्य तेल विक्रय की योजना का राज्य सरकार द्वारा लाभ उठाया गया है। वर्ष 2008 एवं 2009 के दौरान राज्य सरकार द्वारा केन्द्र सरकार से कुल 7209 टन सोयाबीन खाद्य तेल प्राप्त किया गया था जिसका सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से राज्य में वितरण किया गया। किन्तु खुले बाजार में सोयाबीन खाद्य तेल के मूल्य अत्यधिक कम हो जाने के कारण भारत सरकार द्वारा प्रदाय किये जा रहे खाद्य तेल का विक्रय संभव नहीं हो पा रहा था। राज्य सरकार द्वारा खाद्य तेल के विक्रय हेतु अधिक सब्सिडी दिये जाने की भारत सरकार से मांग भी की गई किन्तु भारत सरकार द्वारा इसकी अनुमति नहीं दी गई। इसलिए राज्य सरकार को स्वयं सब्सिडी देकर 40 रूपये लीटर के मूल्य पर इसका विक्रय करना पड़ा जिसके कारण राज्य शासन को 6 करोड़ रूपये की हानि हुई । खाद्य तेल की 5 करोड़ रूपये की राशि भारत सरकार के उपक्रम पीईसी के पास लंबित है, जिसका राज्य को तत्काल भुगतान किया जाना चाहिए। देश के अन्य भागों की भांति नाफेड एवं एनसीसीएफ द्वारा छत्तीसगढ़ राज्य में भी रियायती खाद्य तेल के वितरण हेतु रिटेल आऊटलेट खोला जाए।
सब्सिडी युक्त दाल वितरण योजना के माध्यम से भारत सरकार द्वारा पीली मटर दाल 26 रूपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराई जा रही है। राज्य में पीली मटर 20 रूपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध है। राज्य में सामान्यत: लोगों द्वारा पीली मटर दाल का उपयोग नहीं किया जाता है, ऐसी स्थिति में इसका सार्वजनिक वितरण प्रणाली अथवा अन्य माध्यम से विक्रय करना संभव नहीं है। विगत सप्ताह में दालों के भाव में आई कमी है इसलिए राज्यों के लिए दाल के भाव तय करते समय खुले बाजार में दाल के मूल्यों का ध्यान रखा जाये और भारत सरकार द्वारा अधिक रियायती दर पर राज्यों को दाल उपलब्ध करावें ताकि इसका वितरण पीडीएस के
माध्यम से संभव हो सके।
    माननीय प्रधानमंत्री महोदय, अंत में आपसे अनुरोध है कि विकेन्द्रीकृत उपार्जन योजना का वित्तीय प्रबंधन ठीक किया जाये और राज्यों को ज्यादा अधिकार दिया जाये। आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में वृध्दि पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए आवश्यक विधिक उपायों के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अधिक बेहतर और जनोन्मुखी बनाया जाए एवं अधिक से अधिक खाद्यान्न इसके माध्यम से आम लोगों को उपलब्ध कराया जावे। इससे हम देश के हर नागरिक को पूर्ण मानवीय गरिमा के साथ भोजन उपलब्ध कराने में सफल हो सकेंगे और खाद्य सब्सिडी का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा।

जय हिन्द
जय छत्तीसगढ़

 

 

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