मुख्यमंत्री का वक्तव्य (नई दिल्ली) :खाद्य और सार्वजनिक वितरण प्रणाली हेतु वर्किंग ग्रुप की बैठक
माननीय उपाध्यक्ष, योजना आयोग, माननीय मुख्यमंत्री, असम, माननीय प्रधानमंत्रीजी की आर्थिक सलाहकार परिषद् के अध्यक्ष एवं उपस्थित महानुभावों,
सबसे पहले मैं योजना आयोग के माननीय उपाध्यक्ष को धन्यवाद देना चाहता हूँ कि उन्होंने समाज के कमजोर वर्ग को आवश्यक वस्तुओं के प्रदाय की व्यवस्था को बेहतर और कारगर बनाने तथा खाद्यान्न की भंडारण क्षमता में वृध्दि पर सुझाव देने के लिए वर्किंग ग्रुप की बैठक का आयोजन किया है। पीडीएस को सुदृढ़ करने के लिए छत्तीसगढ़ में हमने कुछ कदम उठाए हैं।
(1) बीपीएल हितग्राहियों की संख्या का निर्धारण:-
मेरा प्रस्ताव है कि अनुसूचित (उप-योजना) क्षेत्रों में निवासरत अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति के सभी परिवारों को पीडीएस हेतु बीपीएल परिवार माना जाए। इससे देश के पिछड़े एवं खाद्यान्न को लेकर असुरक्षित क्षेत्रों में बीपीएल हितग्राहियों के चिन्हाकन में पात्र परिवारों के छूट जाने संबंधी त्रुटियों के निराकरण में बहुत मदद मिलेगी। इसी प्रकार वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों में शासकीय कर्मचारी और आयकरदाताओं को छोड़कर शेष निवासरत सभी परिवारों को पीडीएस के अंतर्गत बीपीएल माना जावे । भारत सरकार के प्रावधान के कारण बहुत से शासकीय पेंशन पर निर्भर निराश्रित बीपीएल सूची में शामिल होने से छूट गए हैं। पीडीएस के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बेहतर होगा कि सभी निराश्रित पेंशनधारियों एवं नि:शक्तजनों को बीपीएल सूची में जोड़ा जाए।
छत्तीसगढ़ राज्य में हम बीपीएल एवं अन्त्योदय परिवारों को 35 किलो अनाज प्रदाय कर रहे हैं। सभी परिवारों के लिए खाद्यान्न की पात्रता 35 किलो बनाए रखी जानी चाहिए और इसे 25 किलो नहीं किया जाना चाहिए, जैसा कि भारत सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा बिल के सैध्दांतिक प्रारूप में प्रस्तावित किया गया है ।
डॉ. एन.सी.सक्सेना की रिपोर्ट देश में निर्धनता के आकलन के यथार्थ के काफी करीब लगती है । अत: अनुरोध है कि इस रिपोर्ट के आधार पर ही अंतत: पीडीएस के लिए बीपीएल परिवारों का निर्धारण कर खाद्यान्न का आबंटन जारी किया जाए । यदि भारत सरकार द्वारा इस रिपोर्ट को तत्काल लागू करने में कुछ समस्या है तो तेंदुलकर कमेटी रिपोर्ट में उल्लेखित बीपीएल परिवारों की संख्या के आधार पर राज्यों को खाद्यान्न का आबंटन तत्काल जारी करना चाहिए ।
छत्तीसगढ़ राज्य में हम बीपीएल एवं अन्त्योदय परिवारों को 35 किलो अनाज प्रदाय कर रहे हैं। सभी परिवारों के लिए खाद्यान्न की पात्रता 35 किलो बनाए रखी जानी चाहिए और इसे 25 किलो नहीं किया जाना चाहिए, जैसा कि भारत सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा बिल के सैध्दांतिक प्रारूप में प्रस्तावित किया गया है ।
डॉ. एन.सी.सक्सेना की रिपोर्ट देश में निर्धनता के आकलन के यथार्थ के काफी करीब लगती है । अत: अनुरोध है कि इस रिपोर्ट के आधार पर ही अंतत: पीडीएस के लिए बीपीएल परिवारों का निर्धारण कर खाद्यान्न का आबंटन जारी किया जाए । यदि भारत सरकार द्वारा इस रिपोर्ट को तत्काल लागू करने में कुछ समस्या है तो तेंदुलकर कमेटी रिपोर्ट में उल्लेखित बीपीएल परिवारों की संख्या के आधार पर राज्यों को खाद्यान्न का आबंटन तत्काल जारी करना चाहिए ।
(2) टीपीडीएस का सरलीकरण एवं सुदृढ़ीकरण :-
निजी व्यक्तियों से उचित मूल्य दुकानें वापस ली जानी चाहिए । छत्तीसगढ़ राज्य की भांति इन दुकानों का संचालन ग्राम पंचायत, सहकारी समिति, महिला स्व-सहायता समूह एवं वन सुरक्षा समितियों द्वारा कराया जाना चाहिए । पीडीएस की वस्तुओं के दुरुपयोग को रोकने के लिए प्रदाय केन्द्रों से उचित मूल्य दुकानों को राशन सामग्री द्वार प्रदाय व्यवस्था के द्वारा उपलब्ध कराया जाना आवश्यक है । छत्तीसगढ़ राज्य में यह कार्य स्टेट सिविल सप्लाईज कार्पोरेशन के माध्यम से किया जा रहा है, जिसके अच्छे परिणाम आये हैं । सामान्यत: माह की 10 तारीख तक आम लोगों की क्रय क्षमता बेहतर रहती है, इसलिए दुकानों में प्रत्येक माह की 7 तारीख तक पीडीएस की वस्तुओं का संपूर्ण भंडारण आवश्यक है ।
कई बार उचित मूल्य दुकान संचालनकर्ता के पास प्रदाय केन्द्रों से पीडीएस की सामग्री के उठाव हेतु आवश्यक राशि नहीं होती है । इसके लिए छत्तीसगढ़ राज्य की भांति उचित मूल्य दुकानों को एक माह की राशन सामग्री क्रेडिट में दिया जाना उचित है। पीडीएस में पारदर्शिता के लिए हितग्राहियों की सूची सार्वजनिक स्थलों में प्रदर्शित की जावे और ग्राम सभा में इसे पढ़कर सुनाया जाये । बेहतर पारदर्शिता के लिए उचित मूल्य दुकान स्तर पर समय समय पर सामाजिक अंकेक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए । छत्तीसगढ़ राज्य में प्रत्येक माह की 7 तारीख को सभी उचित मूल्य दुकानों में चावल उत्सव का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें जनप्रतिनिधियों और नोडल ऑफिसर के साथ-साथ हितग्राहियों की उपस्थिति में पीडीएस सामग्री का वितरण किया जाता है।
पीडीएस से संबंधित शिकायतों के निराकरण के लिए टोल-फ्री कॉल सेंटर या हेल्प लाईन संचालित किया जाना चाहिए, जिसमें शिकायतों को दर्ज करने के अलावा शिकायतों के निराकरण की स्थिति भी वेबसाइट में प्रदर्शित हो।
खाद्यान्न के अतिरिक्त बीपीएल हितग्राहियों को प्रतिमाह दो किलो आयोडाईज्ड नमक दिया जाना चाहिए । छत्तीसगढ़ में सभी बीपीएल कार्डधारियों को प्रतिमाह दो किलो आयोडाईज्ड नमक नि:शुल्क प्रदाय किया जा रहा है । मैं यह भी प्रस्तावित करता हूँ कि देश के अनुसूचित (उप-योजना) क्षेत्रों में पीडीएस के अंतर्गत दाल का वितरण किया जाए ताकि कुपोषण को रोका जा सके । बीपीएल परिवारों को प्रतिमाह दो किलो दाल उपलब्ध कराई जाए, जिसके लिए भारत सरकार द्वारा कम से कम 25 रुपए प्रति किलो की सब्सिडी दी जाए । नाफेड या भारत सरकार के किसी अन्य सार्वजनिक उपक्रम द्वारा दाल की थोक आपूर्ति स्टेट सिविल सप्लाईज कार्पोरेशन को की जावे ।
एपीएल कार्डधारियों के लिए खाद्यान्न की पात्रता 35 किलो से कम न की जाए एवं इन्हें बीपीएल दर से थोड़ी अधिक दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाए। उचित मूल्य दुकानों के भलीभांति संचालन के लिए दुकान सह गोदाम आवश्यक हैं। हमने बीआरजीएफ, जनजाति विकास प्राधिकरण, 12 वें वित्ता आयोग की राशि से लगभग चार हजार उचित मूल्य दुकानों के लिए दुकान-सह-गोदामों का निर्माण कराया है । ऐसे जिले जहाँ बीआरजीएफ योजना लागू नहीं है, वहाँ दुकान सह गोदाम के निर्माण हेतु भारत सरकार द्वारा अनुदान दिया जाना चाहिये। भारत सरकार द्वारा कल्याणकारी संस्थाओं हेतु राज्य की मांग अनुसार खाद्यान्न जारी नहीं किया जा रहा है। कल्याणकारी संस्थाओं के लिए खाद्यान्न आबंटन बढ़ाया जाना चाहिए ताकि गरीब लोगों के लिए संचालित शासकीय छात्रावासों के अतिरिक्त गरीबों के लिये संचालित निजी छात्रावासों और संस्थाओं को भी योजना का लाभ मिल सके । छत्तीसगढ़ के शहरी एवं अर्ध्दशहरी क्षेत्रों में 152 दाल-भात केन्द्र संचालित हैं, जिनके द्वारा प्रतिदिन 15 से 20 हजार लोगों को 5 रुपए में भरपेट दाल-भात उपलब्ध कराया जा रहा है । इस प्रकार के सस्ते भोजनालय देश भर में खोले जाने चाहिए।
खाद्यान्न की खरीदी के लिए बहुत से राज्य, विकेन्द्रीकृत उपार्जन (डीसीपी) राज्य के रूप में कार्य कर रहे हैं । किन्तु भारत सरकार द्वारा इन राज्यों के क्लेम एवं हानि राशि की प्रतिपूर्ति समय पर नहीं की जा रही है। इसके कारण राज्यों को गंभीर आर्थिक हानि हो रही है । छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में पिछले 9 सालों में 22 सौ करोड़ रुपए से अधिक की आर्थिक हानि हो चुकी है, लेकिन हमारे क्लेम्स का समय पर भुगतान नहीं हो रहा है । स्टेट सिविल सप्लाईज कार्पोरेशन द्वारा प्रस्तुत की जा रही पीडीएस के खाद्य सब्सिडी क्लेम का भी समय पर भुगतान न होने के कारण ब्याज के रूप में बड़ी आर्थिक हानि हमें हो रही है । भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 11.25 प्रतिशत ब्याज दर पर राज्य को उपार्जन हेतु राशि उपलब्ध कराई जा रही है । इसके अलावा 2 प्रतिशत दण्ड ब्याज के रूप में लिया जा रहा है, क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक, राज्य की एजेंसी की प्राप्ति-योग्य राशि को गारंटी के रूप में अधिकृत नहीं किया जाता है । ब्याज की यह दर असामान्य रूप से अधिक है, जिसके कारण महंगाई में लगातार वृध्दि हो रही है। खाद्यान्न की खरीदी हेतु भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा राज्यों को 4 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराना चाहिए ।
छत्तीसगढ़ राज्य में उत्पादित धान की अधिकांश किस्में उसना मिलिंग के योग्य है। भारत सरकार द्वारा सेंट्रल पूल हेतु उसना चावल प्राप्त नहीं किए जाने के कारण बहुत समस्या हो रही है। टेस्ट मिलिंग रिपोर्ट के बावजूद पिछले एक दशक से अरवा कस्टम मिलिंग चार्ज बढ़ाये नहीं गये हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्य को प्रतिवर्ष लगभग 50 करोड़ रुपए की हानि हो रही है।
आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में प्रस्तावित संशोधन:
(क) आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 से संबंधित अपराध वर्तमान में धारा '10-क' के अंतर्गत संज्ञेय और जमानती (Cognizable and bailable) हैं। वर्ष 1981 में भारत सरकार द्वारा लागू आवश्यक वस्तु (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1981 के द्वारा 15 वर्ष के लिए इसे संज्ञेय और गैर जमानती बनाया गया । यह अवधि समाप्त होने के उपरांत वर्ष 1996 के पश्चात इस अधिनियम के अपराध जमानती हो गये हैं। वर्तमान में खुले बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी एवं जमाखोरी तथा मूल्यों में असामान्य वृध्दि को दृष्टिगत रखते हुए इस अधिनियम के अपराधों (विशेषकर पीडीएस राशन सामग्री के लिए) को गैर जमानती बनाया जाना उचित होगा ।
(ख) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत प्रकरणों के लिए 90 दिवस/150 दिवस के भीतर निराकृत करने की समय-सीमा तय की गई है। इन प्रावधानों के कारण देश की उपभोक्ता अदालतों में दर्ज प्रकरणों में से लगभग 90 प्रतिशत प्रकरण निराकृत हो चुके है। आवश्यक वस्तु अधिनियम के प्रकरण भी आम उपभोक्ताओं की दैनिक आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति से संबंधित हैं, अत: इनके निराकरण के लिए भी समय-सीमा तय किया जाना आवश्यक है ।
(ग) आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 6 (क) के अंतर्गत जिस वाहन में आवश्यक वस्तु का अवैध परिवहन पाया जाता है, उसे राजसात करने का प्रावधान नहीं है। वन अधिनियम की तरह ही आवश्यक वस्तु अधिनियम में यह प्रावधान जोड़ा जाना उचित होगा।
(ख) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के अंतर्गत प्रकरणों के लिए 90 दिवस/150 दिवस के भीतर निराकृत करने की समय-सीमा तय की गई है। इन प्रावधानों के कारण देश की उपभोक्ता अदालतों में दर्ज प्रकरणों में से लगभग 90 प्रतिशत प्रकरण निराकृत हो चुके है। आवश्यक वस्तु अधिनियम के प्रकरण भी आम उपभोक्ताओं की दैनिक आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति से संबंधित हैं, अत: इनके निराकरण के लिए भी समय-सीमा तय किया जाना आवश्यक है ।
(ग) आवश्यक वस्तु अधिनियम की धारा 6 (क) के अंतर्गत जिस वाहन में आवश्यक वस्तु का अवैध परिवहन पाया जाता है, उसे राजसात करने का प्रावधान नहीं है। वन अधिनियम की तरह ही आवश्यक वस्तु अधिनियम में यह प्रावधान जोड़ा जाना उचित होगा।
(3) पीडीएस व्यवस्था का कम्प्यूटरीकरण (एफसीआई गोदाम सहित) :-
राज्य के राशनकार्डधारियों के विवरण का कम्प्यूटरीकरण कर वेबसाइट में डेटा-बेस प्रदर्शित किया जाना चाहिए। छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा यह किया जा चुका है और इससे काफी पारदर्शिता आयी है। उचित मूल्य दुकानों को राज्य स्तर से राशन सामग्री का ऑनलाईन आबंटन जारी किया जाना चाहिए। इससे समय की बचत होने के साथ-साथ निचले स्तर पर आबंटन में बेईमानी की संभावना समाप्त होती है। पीडीएस प्रदाय केन्द्रों को ऑनलाईन किया जाना तथा प्रत्येक उचित मूल्य दुकान को प्रदाय सामग्री की जानकारी तत्काल प्रदर्शित किया जाना आवश्यक है। इससे राशन सामग्री की उपलब्धता के प्रबंधन और बेहतर निगरानी में मदद मिलेगी। पीडीएस प्रदाय केन्द्र से उचित मूल्य दुकानों को सामग्री प्रदाय के लिए ट्रक रवाना होते ही संबंधित क्षेत्र के लोगों को एसएमएस द्वारा इसकी जानकारी दी जानी चाहिए। छत्तीसगढ़ में यह व्यवस्था पिछले दो वर्षों से लागू है और इसके बहुत अच्छे परिणाम रहे हैं।
प्रत्येक राशनकार्डधारी को स्मार्ट कार्ड दिया जाना चाहिए, किन्तु इसे यूआईडी मानदण्डों के अनुरूप होना चाहिए। चूँकि इस कार्य में काफी अधिक राशि का व्यय होगा, अत: भारत सरकार द्वारा वित्तीय सहायता दी जानी चाहिए। छत्तीसगढ़ राज्य इस हेतु पूर्णत: तैयार है, अत: भारत सरकार द्वारा इस योजना में छत्तीसगढ़ को पायलेट राज्य के रूप में शामिल किया जाए।
(4) भंडारण क्षमता का विकास :-
भारत सरकार द्वारा खाद्यान्न के भंडारण हेतु गोदाम लिए जाने की उदार 10 वर्षीय गारंटी योजना विकसित की जानी चाहिए। छत्तीसगढ़ में स्टेट वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन को गोदामों के निर्माण हेतु गाइडलाइन दर के 75 प्रतिशत मूल्य पर भूमि उपलब्ध कराने हेतु कलेक्टर्स को अधिकृत किया गया है। वार्षिक लीज दर भी आधी कर दी गई है। इसके कारण स्टेट वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन द्वारा विगत एक वर्ष में 2.12 लाख टन क्षमता के 68 नए गोदाम निर्माण करना संभव हो सका है। डीसीपी राज्यों में एफसीआई के पास पर्याप्त भंडारण क्षमता होनी चाहिए क्योंकि रेल रेक उपलब्धता तथा प्राप्ति स्थल पर स्थान की उपलब्धता पर ही अतिरिक्त स्टॉक का परिवहन संभव हो पाता है।
खाद्यान्य की कमी वाले जिलों, पहुंचविहीन क्षेत्रों और अनुसूचित क्षेत्रों में पीडीएस के 8 माह के आबंटन से कम भंडारण क्षमता नहीं होनी चाहिए। इससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में बहुत मदद मिलेगी। ऐसे क्षेत्रों के लिए भारत सरकार द्वारा 75 प्रतिशत केपिटल सब्सिडी वाली सेंट्रल सेक्टर की योजना लायी जानी चाहिए। स्टेट वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन की आय को आयकर से मुक्त किया जाना चाहिए ताकि नए गोदामों के निर्माण को प्रोत्साहन मिले।
वर्तमान में देश का सम्पूर्ण अतिरिक्त खाद्यान्न पंजाब और हरियाणा में भंडारित है। भारत सरकार को देश के मध्य क्षेत्र में खाद्यान्न के बफर हेतु बड़े गोदामों को निर्मित करने की रणनीति बनाना चाहिए। मध्य क्षेत्र से देश के किसी भी क्षेत्र में खाद्यान्न का परिवहन ज्यादा सुगम होगा। यदि भारत सरकार इससे सहमत हो तो छत्तीसगढ़ शासन भारत सरकार को इस कार्य में हरसंभव सहायता करेगा।
अंत में आपसे अनुरोध है कि विकेन्द्रीकृत उपार्जन योजना का वित्तीय प्रबंधन ठीक किया जाये और राज्यों को ज्यादा अधिकार दिये जायें। आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में वृध्दि पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए आवश्यक विधिक उपायों के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अधिक बेहतर और जनोन्मुखी बनाया जाए एवं अधिक से अधिक खाद्यान्न इसके माध्यम से आम लोगों को उपलब्ध कराया जावे। इससे हम देश में हर नागरिक को पूर्ण मानवीय गरिमा के साथ भोजन उपलब्ध कराने में सफल हो सकेंगे और खाद्य सब्सिडी का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा ।
खाद्यान्य की कमी वाले जिलों, पहुंचविहीन क्षेत्रों और अनुसूचित क्षेत्रों में पीडीएस के 8 माह के आबंटन से कम भंडारण क्षमता नहीं होनी चाहिए। इससे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में बहुत मदद मिलेगी। ऐसे क्षेत्रों के लिए भारत सरकार द्वारा 75 प्रतिशत केपिटल सब्सिडी वाली सेंट्रल सेक्टर की योजना लायी जानी चाहिए। स्टेट वेयरहाउसिंग कार्पोरेशन की आय को आयकर से मुक्त किया जाना चाहिए ताकि नए गोदामों के निर्माण को प्रोत्साहन मिले।
वर्तमान में देश का सम्पूर्ण अतिरिक्त खाद्यान्न पंजाब और हरियाणा में भंडारित है। भारत सरकार को देश के मध्य क्षेत्र में खाद्यान्न के बफर हेतु बड़े गोदामों को निर्मित करने की रणनीति बनाना चाहिए। मध्य क्षेत्र से देश के किसी भी क्षेत्र में खाद्यान्न का परिवहन ज्यादा सुगम होगा। यदि भारत सरकार इससे सहमत हो तो छत्तीसगढ़ शासन भारत सरकार को इस कार्य में हरसंभव सहायता करेगा।
अंत में आपसे अनुरोध है कि विकेन्द्रीकृत उपार्जन योजना का वित्तीय प्रबंधन ठीक किया जाये और राज्यों को ज्यादा अधिकार दिये जायें। आवश्यक वस्तुओं के मूल्यों में वृध्दि पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए आवश्यक विधिक उपायों के साथ-साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अधिक बेहतर और जनोन्मुखी बनाया जाए एवं अधिक से अधिक खाद्यान्न इसके माध्यम से आम लोगों को उपलब्ध कराया जावे। इससे हम देश में हर नागरिक को पूर्ण मानवीय गरिमा के साथ भोजन उपलब्ध कराने में सफल हो सकेंगे और खाद्य सब्सिडी का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सकेगा ।
जय हिन्द
जय छत्तीसगढ़

